शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिस प्रकार मद्य प्राणीको मत्त कर देता है इसी प्रकार अज्ञानहीन तत्त्वज्ञानयुक्त ब्राह्मणको भी प्रारब्धकर्म नही छोड़ता ॥४१॥ बहुत कहने से क्या है यह काम प्रारब्ध का मन्त्री है, यह मुझको दिनरात पीड़ा देता है और इसी प्रकारसे अहंकार भी दुःख देता है ॥४२॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे अगस्त्यराघवसंवादे वैराग्योपदेशोनाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ जीव अत्यन्त पीडित होकर स्थूल देह को त्याग करता है । इस कारण हे ब्राह्मण! मेरे जीवन के निमित्त उपाय करो ॥४३॥ इति श्रीप० शिवगीतासू० ब्रह्मवि० यो० अगस्त्यराघवसंवादे भाषाटीकायां वैराग्योपदेशो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
अध्याय ३ अगस्त्यजी बोले कामक्रोधादिसे पीडित हो मनुष्य हितकारी वचन नही सुनता, उसको हितकारी वचन ऐसे अच्छे नही लगते जैसे मरणशीलको औषधि अच्छी नही लगती ॥१॥ जिस सीता को मायावी दैत्य सागरके बीचमें ले गया है, हे राम! वह तुम्हारे निकट अब किस प्रकारसे आ सकती है ॥ २॥ जिसके द्वारपर वानरोंके यूथोंके समान सब देवता बांध लिये गये है । देवताओंकी स्त्री जिसके यहां चमर ढोरती है ॥३॥ जो शिवजी के वर से गर्वित हो सम्पूर्ण त्रिलोकी को भोगता है और भय से रहित है उसे तुम कैसे जीतोगे ॥४॥ इन्द्रजित भी उसका पुत्र शिव के वरदान से गर्वित है उसके आगे से देवता संग्राम में बहुतबार भाग गये है ॥५॥ देवताओं को भय देनेवाला जिसका भाई कुम्भकर्ण बड़ा भयंकर है और अनेक प्रकार दिव्यास्त्र धारण करनेवाला चिरंजीवी विभीषण है ॥६॥ देव और दानवोंको दुर्गम जिसका लंकानाम दुर्ग है, और करोड़ो जिसके यहां चतुरंगिणी सेना है ॥७॥ हे राजन! फिर अकेले तुम उसे कैसे जीतोगे, तुम्हारी यह बात ऐसी है, कि जैसे कोई बालक चन्द्रमाको हाथसे लेना चाहे इसी प्रकार तुम काम से मोहित होकर उसके जीतने की इच्छा करते हो ॥८॥ श्रीरामचन्द्रजी बोले हे मुनिश्रेष्ठ! मै क्षत्रिय हूं और मेरी भार्या राक्षसने हरण कर ली है, जो मै उसे न मारूंगा तौ मेरे जीने से क्या फल है ॥९॥ इस कारण तुम्हारे तत्वबोधसे मुझे कुछभी प्रयोजन नही है, यह कामक्रोधादिक मेरे शरीरको भस्म किये डालते है ॥१०॥ और अपनी प्रियाके हरण होने और शत्रुसे पराभव होनेसे अहंकारभी नित्य और मेरे जीवनको हरण करनेको उद्यत है ॥ ११॥ हे मुनिश्रेष्ठ! जिसको तत्त्वज्ञान की इच्छा हो वह लोकके पुरुषों में नीच है । इस कारण सागर लंघकर युद्धमे उसके मारने के उपायको आप कहिये आपसे श्रेष्ठ और कोई मेरा गुरु नही ॥१२॥ अगस्त्य उवाच ॥ अगस्त्यजी बोले । जो ऐसी इच्छा है, तो पार्वतीके पति शिव अविनाशी की शरण में जाओ, वह भगवान प्रसन्न होकर तुमको मन वांछित फल देंगे ॥१३॥ इन्द्रादि देवता हरि और ब्रह्माभी जिसको नही जीतसके वह शिवजीके अनुग्रह बिना तुमसे कैसा मारा जायगा ॥१४॥ इस कारण विरजामार्गसे मै तुमको दीक्षा देता हूँ इस मार्ग से तुम मनुष्यपन छोड़कर तेजोमय हो जाओगे ॥१५॥ जिसके प्रतापसे युद्धमे शत्रुओंको मारकर सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त हो जाओगे और सम्पूर्ण धरामंडलको भोगकर अन्तमें शिवलोकको जाओगे ॥१६॥