भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 44 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 12

भारतादि इतिहास, ब्राह्मपुराणादि पुराण, कल्पसूत्र, उनका प्रवर्तक बोधायनादि ऋषि, नाराशंसी नामक रुद्रतत्त्वके प्रतिपादक मुख्य तत्त्व कीं प्रतिपादनै करनेवाली गोथा, उपासनाकाण्ड, उपनिषद् यह सब मै ही हूँ ॥१७॥ 'तदप्येश श्लोको भवति' इत्यादि श्लोक सांख्ययोगादि सूत्र व्याख्यान अनुव्याख्यान गान्धर्वगान विद्यादि यज्ञहोम आहुति ॥१८॥ गाय आदि दानके पदार्थ दान देना, यह लोक, अविनाशि पर लोक, क्षर-प्राणीमात्रों के हृदयमें वास करनेहारा, इन्द्रियनिग्रह, मनोनियह और खग-जीवनभी मै ही हूँ, सब वेदोंमें गूढ भी ही हूँ, निर्जनस्थानवासी भी मैं हूँ, जन्मरहितभी मैं ही हूँ ॥१९॥ पुष्कर, पवित्र, सबके मध्य और बाहर भीतर आहे अविनाशी मै ही हूँ ॥२०॥ तेज, अन्धकार, इन्द्रिय, इन्द्रियके गुण, बुद्धि, अहंकार और शब्दादि विषय मै ही हूँ ॥२१॥ ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, उमा, स्कन्द, गणपति, इंद्र, अग्नि, यम, निरृति, वरुण, वायु ॥२२॥ कुबेर, ईशान, भूःभुव, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यं, यह सात लोक, पृथ्वी, जल, वायु ॥२३॥ आकाश, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, ग्रह, प्राण, काल, मृत्यु, अमृत, भूत, प्राणी यह सब मै ही हूँ ॥२४॥ वर्तमान और भविष्य मै ही हूँ, सम्पूर्ण विश्व सर्वरूपभी मै ही हूँ ओंकारके आदि और मध्यमें भूर्भुवः स्वः मै ही हं और गायत्री शीर्ष जपनेवालोंका विराट् स्वरूप भी मै ही हूँ ॥२५॥ भक्षण, पान, कृत, अकृत, (नही किया) तथा पर, अपर, मै ही हूँ और सबका आश्रय मै ही हूँ ॥२६॥ मै ही जगत का हित, अक्षर, सूक्ष्म, दिव्य, प्रजापति, पवित्र, सोम, देवता, अग्राह्यं (जो ग्रहण करने में न आवै) और सबका आदि मे ही हूँ ॥२७॥ मै ही सबका उपसंहार करनेवाला, मै ही पर्वत, सागर इत्यादि गुरुवस्तु और प्रलयकालिक अग्नि सूर्यादितेज इन सब पदार्थों में विद्यमान हूँ, मै ही सब प्राणियों के हृदयमें देवता और प्राणरूप से स्थित हूँ ॥२८॥ जिसका शिर (स्पर्श संज्ञकवर्ण) उत्तरको, और जिसके पाद (उष्म संज्ञक वर्ण) दक्षिणको और जिसके अन्तर अन्तस्थसंज्ञक वर्ण) मध्यमें है ऐसा त्रिमासिक साक्षात ओंकार मैं हूँ ॥२९॥ जिस कारणसे कि मैं जप करनेवालों को स्वर्गादि लोकको ले जाता हूँ पुण्यक्षीण पुरुषोंको नीचे ले ता हौं, इस कारण मै एक निरन्तर नित्य सनातन ओंकार हूँ ॥३०॥ यज्ञकर्म में ब्रह्मा नामक ऋत्विक होकर ऋग्यजु और सामके मन्त्र ऋत्विजो को देता हूँ, इस कारण मैं ही प्रणवस्वरूप हूँ, तात्पर्य यह कि सब मै ही हूँ ॥३१॥ जैसे घृत तैलादि स्नेह द्रव्य मांसपिंडमें व्यापत होकर भक्षण करनेवाले की सब देह को व्याप्त करते है, इसी प्रकार सब लोकोंमें अधिष्ठानरूप से व्याप्त होकर मै सर्वव्यापी हूँ ॥३२॥ ब्रह्मा हरि भगवान् व और दूसरे देवभी मेरा आदि और अन्त नही ऐसा जानते इस कारणसे मैं अनन्त हूँ ॥३३॥ गर्भवास जन्म जरा मृत्युसे भरे संसारसागर से मै भक्तोंको तारता हूँ इस कारण मेरा नाम तारक है ॥३४॥ जरायुजु, स्वेदज, अंडज, अद्भि्ज इन चार प्रकारके देहो में मै जीवरूपसे वास करता हूँ, और इनके हृदयाकाशमें सूक्ष्मरूप होकर वास करता हूँ, इससे मै सूक्ष्म कहता हूँ ॥३५॥ महान्धकारमें मग्न हुए भक्तों को उद्धार करनेके निमित्त बिजलीकी समान दीप्तिमान् निरुपम तेजरूप प्रगट करता हुं इस कारण मै विद्युत्स्वरूप हूँ ॥३६॥ जिस कारणसे कि मै एकही लोकोंको उत्पन्न अरु संसार करके लोकान्तरमें पहुँचाता हूँ अरु ग्रहण करता हूँ इस कारणसे मुझे स्वतंत्र और एक ईश्वर कहते है ॥३७॥ प्रलयकालमें कोई दूसरा स्थित नही रहता केवल मै ही तीन गुणोंसे परे स्वयं ब्रह्मरुद्रस्वरूप सब प्राणियों को अपने में लय करके स्थित होता हूँ ॥३८॥ जो कि मै सब लोकोंकी ईशिनी अर्थात् सब लोकोंको स्वाधीन रखनेवाली शक्तियों से स्वाधीन रखता हूँ उन पर सत्ता चलाता हूँ इस कारण सर्वद्रष्टा सबका चक्षु मै ईशान कहाता हूँ ॥३९॥ मै स्थिर और चर सब प्राणियों का सदा ईश्वर हू तथा सब विद्याओंका अधिपति हूँ, अर्थात् सर्व ईश्वर शक्तिसम्पन्न हूँ, इससे मेरा ईशान नाम सार्थक है ॥४०॥