शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished44 पृष्ठ
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मैं सब अतीत और अनागत पदार्थोंको आत्मज्ञानसे देखता हूँ, इसी प्रकार साधनसम्पन्न पुरुष को आत्मज्ञानरूपयोग का उपदेश करता हूँ और सबमें व्यापने से मै भगवान ऐश्वर्यवाने हूँ ॥४१॥ मै निरन्तर सब लोकोंकी उत्पत्ति, पालन और संहार करता हूँ, इस कारण मुझे महेश कहते है ॥४२॥ महत् पुरुषों में आत्मज्ञान और अष्टांग योगसे जो महिमा विद्यमान है और जो सब पदार्थों को उत्पन्न करके रक्षा करता है वह महादेव मै ही हूँ ॥४३॥ मै ही श्रुतिप्रतिपादित एक देव सम्पूर्ण दिशाओंमें वर्तमान हूँ मै ही सबसे प्रथम गर्भमें वास करनेहारा, गर्भसे निकलनैहारा और पीछे उत्पन्न होनेहारा हू मै ही सम्पूर्ण लौक हूँ और सब दिशाओं में मेरा ही मुख है ॥४४॥ सर्वत्र मेरे नेत्र सर्वत्र मेरा मुख सर्वत्र मेरी भुजा और सर्वत्र मेरे चरण है मै ही भुजा और चरणोंसे स्वर्ग और भूमिको उत्पन्न करता हुआ एक देवस्वरूप हूँ ॥४५॥ केशके अग्रभागकी समान सूक्ष्मरूप हृदयमें रहनेवाला, विश्वव्यापक, स्वप्रकाश, श्रेष्ठ आत्मस्वरूप मै हूँ मुझे जो चतुर पुरुष तत्त्वमस्यादि वाक्यों के ज्ञानसे (वह तू है) ऐसी उपाधि त्यागकर जीव और ब्रह्म को एकता से देखतै है अर्थात ऐकस्वरूप जानते है वही निरन्तर मोक्ष को प्राप्त होते है दूसरे नही ॥४६॥ सीपी में जो रजतबुद्धि है यह भ्रम ही है परन्तु रजतके भ्रमका आधार शुक्ति यथार्थ है उसी प्रकार मेरे स्वरूपमें भासनेहारा जगत् मिथ्या है परन्तु उसका आधार मै सत्य तथा एकरूप हूँ मै ही यह पंचभूतात्मक जगत् धारण किये हूँ ऐसे मुझे ईश्वरके स्वरूपमें जो विवेक करेगा उसको अनन्त शान्ति अर्थात् मुक्तिकी प्राप्ति होगी ॥४७॥ प्राणका ही अन्तर्गत मन है वहां क्षुधा पिपासा और तृष्णा रहती है इससे शुभाशुभ फल प्राप्तिका कारण जो धर्म अधर्म है उसके भी कारण विषयतृष्णा को छिन्नकर निश्चयात्मक बुद्धि मुझमें अन्तःकरण लगाकर जो मेरा ध्यान करते है उनको निरन्तर शांति और मोक्षसुख प्राप्त होता है दूसरोंको नही ॥४८॥ जहां वीणा की गति नही जहां मन नहीं पहुंच सकता इस प्रकार आनन्द ब्रह्मरूप मेरे जाननेवाले को कहीं से भय प्राप्त नही होता ॥४९॥ इस कारण देवता मेरे वचन जो कि आत्मस्वरूप जानके देनेवाले है सुनकर मेरा नामका जप करके मेरेही ध्यानपरायण हुए ॥५०॥ देहान्तमें वे सब मेरे सायुज्यको प्राप्त होगये । जो कुछ ये पदार्थ दीखते है यह सब मेरी ही विभूति है ॥५१॥ यह सब वस्तु मुझहीसे उत्पन्न है औरु मुझही में प्रतिष्ठित है और अन्तमें मुझमें ही लय हो जाती है मैं ही अद्वय ब्रह्म हूँ ॥५२॥ मै ही सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म महानसे भी महान मै ही विश्वरूप निर्लेप पुरातन पुरुष सर्वेश्वर तेजोमय और शिवरूप हूँ ॥५३॥ मेरे हस्त चरण नही और सब कुछ कर सकता हूँ मेरी शक्ति किसी के ध्यानमें नही आती मेरे भौतिक नेत्र नही तथापि सब कुछ देखता हूँ कान नही और सब कुछ सुनता हूँ मै सत् असत् सब विचारको जानता हूँ मेरा एकान्तस्वरूप हूँ मेरा जाननैवाला कोई नही मै सदा चैतन्यस्वरूप हूँ ॥५४॥ सम्पूर्ण वेदोंमें मै ही जानने योग्य हूँ वेदान्तका कर्ता और वेदका जाननेवाला भी मै ही हूँ । मुझमें पाप और पुण्य नही, मेरा नाश तथा जन्म नही मुझे देह इन्द्रिय और बुद्धिका संबंध नही है ॥५५॥ भूमि, जल, तेज, वायु आकाश इनसे मै लिप्त नही हूँ । इस प्रकारसे पंचकोशात्मक गुहामें निवासा करनेहारा निर्विकार संगरहित सर्वसाक्षी कार्यकारण भेदशून्य परमात्मा हूँ । जो मुझको इस प्रकार मै जानते है वह मेरे शुद्ध परमात्मस्वरूप को प्राप्त होते है ॥५६॥ हे महाबुद्धिमन्! रामचन्द्र! इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जानता है वही संसारमें मुक्त होता है दूसरा नही ॥५७॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु० विभूति योगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
अध्याय ७