शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामचन्द्र बोले - हे भगवन् ! जो कुछ मैने प्रश्न किया है वह तो उस प्रकार स्थित है, हे महेश्वर! आपने इस विषयका कोई उत्तर नही दिया ॥१॥ हे महेश्वर ! आपका देह परिच्छिन्नपरिमाण अर्थात् इयत्ता करनेके योग्य है फिर सब संसारकी उत्पत्ति पालन नाश कैसे करते हो ॥२॥ इसी प्रकार अपने २ अधिकार के पालन करनेवाले इन्द्र वरुणादि सब देवता तुम्हारी देह में कैसे रहते है और वे सब देवता और चौदह भुवन यह मैं ही हूँ, ऐसा जो तुम कहते तो कैसे कहते हो अर्थात् जबतक उपाधि है तबतक जीव ईश्वरका अभेद संभौवित नही होता और जड प्रपंच महाभूतोंमें चेतनाका तादाम्य संभावति नही ॥३॥ हे देव! आपसे उत्तर सुना परन्तु संदेह नही जाता कारण कि चित्तका निश्चय नही उस सन्देहकी दूर करनेको आपही समर्थ हो ॥४॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान् बोले ! सूक्ष्म वटके बीजमें जिस प्रकार महान वटका वृक्ष सदा रहता है और उसीसे वह वृक्ष निकल भी आता है यदि ऐसा न हो तो बताओ वह वृक्ष कहां से आता है इसी प्रकार मेरे सूक्ष्म शरीरसे सब भूतोंका जन्म पालन और नाश होता है ॥५॥ जिस प्रकारसे जलके बीचमें बड़ा सैन्धैका खण्ड डालनेसे वह उसमें विलीन होजाता है और नही दीखता पीछे जलको अग्निमें औटाने से वह पूर्ववत् प्राप्त हो जाता है ॥६॥ अथवा जैसे प्रतिदिन सूर्यसे प्रकाश उत्पन्न होता और संध्या समय विलीन हो जाता है इसी प्रकार मुझसे जगत् उत्पन्न होकर विलीन हो जाता है और मुझमें हि स्थिर रहता है । हे सुव्रत राम! तुम ऐसा जानो ॥७॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचंद्र बोले- हे भगवन् ! आपने दृष्टान्तसे प्रतिपादन किया परन्तु जिस प्रकार दिशाओंके भ्रमवाले को उत्तरादि दिशाओंका भ्रम हो जाता है, इसी प्रकार मुझे भ्रम हो गया है । वह निवृत्त नही होता मै क्या करूं ॥८॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान बोले - हे राम ! जिस प्रकार यह चराचर जगत् मुझमें वर्तमान है, सो मैं तुमको दिखाता हूँ परन्तु तुम उसे देखनेको समर्थ नही ॥९॥ इस कारण उसके देखनेको मै तुम्हे दिव्यनेत्र देता हूँ, उन नेत्रोंसे भय त्यागकर तुम मेरा दिव्य स्वरूप देखो ॥१०॥ नरेन्द्र वा देवता इस मेरे तेज स्वरूपको मेरे अनुग्रह बिना चर्म चक्षुसे नही देखे सकते ॥११॥ सूत उवाच । सूतजी बोले ऐसा कहकर शिवजीने रामचन्द्रको दिव्यनेत्र दिये और पातालकी समान बडा विस्तृत मुख रामचन्द्रको दिखाया ॥१२॥ करोड़ो बिजलीकी समान प्रकाशमान अतिशय भयदायक भयंकर उस रूपको देखतेही रामचन्द्र जंघाओं के बलसे पृथ्वी में बैठ गये ॥१३॥ प्रणाम और दंडवत् करके शिवजीको बारंबार प्रसन्न करने लगे फिर महाबली रामचन्द्र उठकर जबतक देखते है ॥१४॥ जबतक त्रिपुरघाती शिवजीके मुखमें करोड़ो ब्रह्मान्ड प्रलय कालकी अग्निमें व्याप्त होकर चटका पक्षीके पंखो कि समान दीखे ॥१५॥ सुमेरु, मंदराचल, विंध्याचलादि पर्वत, सात समुद्र, चंद्र सूर्यादि सब ग्रह, पांच महाभूत और शिवजीके साथ आये हुए सब देवता ॥१६॥ वन, बड़े २ सर्प, चौदह भुवन इस प्रकार रामचन्द्रने प्रत्येक ब्रह्माण्डको देखकर ॥१७॥ उन्हींमें पूर्वकालमे हुआ देवता और असुरोंका संग्रामभी देखा विष्णुके दश अवतार और उनके र्कतव्य कंसवध रावणवध आदि ॥१८॥ युद्धमें देवताओंकी पराजय, शिवजीका त्रिपुरासूरको मारना इसी प्रकार उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जीवों का लय देखकर ॥१९॥ रामचंद्र भयभीत हो बारंबार प्रणाम करने लगे । यद्यपि रामचन्द्र को तत्त्वज्ञान भी हो गया था तथापि भयभीत हो गये ॥२०॥