भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

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तब उपनिषदोंका सार और अर्थरूप वाणीसे शिवजीकी स्तुति करने लगे ॥२१॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्र बोले । हे विश्वेश्वर ! हे शरणागतदुःखनाशक, हे चन्द्रशेखर ! प्रसन्न हूजिये और संसारके भयसे मुझ अनाथकी रक्षा कीजिये ॥२२॥ हे शंकर ! यह भूमि और इस पर उत्पन्न होनेवाले वृक्षादि सब आपसे ही उत्पन्न हुए है यह सब नित्य तुमही में स्थित रहते है । हे शिवे ! अन्तमें यह सब तुम्हीमें स्थित हो जाते है ॥२३॥ ब्रह्मा, इन्द्र, एकादश, रुद्र, मरुद्गण, गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्ध, गंगादि नदी, सागर यह सब हे शूल धारणकरनेवाले ! तुम्हारे मुखमें दीखते हैं ॥२४॥ हे चन्द्रमौले ! तुम्हारी मायासे कल्पित हुआ यह विश्व तुम्हारे ही स्वरूपमें प्रतीत होता है, इसे भ्रांतियुक्त होकर पुरुष इस प्रकारसे देखते है जिसप्रकारसे शुक्तिमें रजतका और रस्सीमें सर्पका भ्रम उत्पन्न होता है, वह भाँति वैसी नहीं है यह जैसी भ्रांति होती है वह पदार्थ अन्यत्र सिद्ध होता है और नही भी होता, जैसे शुक्तिमें रजतकी भाँति हुई । परन्तु रूपा पदार्थ दूसरे स्थानमें विद्यमान है, तैसे यह जगत् तुम्हारे स्वरूपसे बचकर अन्यत्र नही दीखता इसीसे लोक इसको शुक्तिका रजतेवत् भ्रम मानते है ॥२५॥ आप अपने तेजसे सब जगत् व्याप्त और प्रकाश करते हो । हे देवदेव ! आपके प्रकाश के बिना तो हज जगत् क्षणमात्रमें अदृश्य हो जाय ॥२६॥ जो पदार्थ थोडे आश्रयवाला है वह बडे पदार्थको धारण करनेमे समर्थ नही होता, जिसप्रकार एक अणु विंध्याचलको धारण नही कर सकता और तुम्हारे मुखमात्रमें यह सब जगत् दीखता है । यह सब आपकी माया है, वास्तविक नही ऐसा मुझे निश्चय है ॥२७॥ जिस प्रकारसे रज्जमें सर्प की भ्रांति भयदायक होती है, यद्यपि वहां वास्तवमें सर्प उत्पन्न नही होता और भ्रमके नाश होनेपर सबका नाशभी नही होता (यथार्थ ही है कि जो उत्पन्न नही हुआ उसका नाश होनेवाला नही) परन्तु यह भय देनेवाला होता है इसी प्रकार तुम्हारी मायासे जिसको अस्तित्व प्राप्त हुआ है, ऐसा यह जगत् मिथ्या भ्रांतिकै कार्य को सत्य उत्पन्न करता है ॥२८॥ जो यह तुम्हारा शरीर जगतका आधारभूत दीखता है यदि विचार दृष्टिसे देखा जाय तो भी यह अज्ञान दृष्टि की कल्पना है कारण कि तुम सच्चिदानन्दरूप और सर्वत्र पूर्ण हो ॥२९॥ ऐसा है तो कर्मकाण्डप्रतिपादक सर्व श्रुति व्यर्थ हुई, पर ऐसा नही । यज्ञ इष्टापूर्त दान अध्ययनादि कर्मोंका फल तुम कर्त्ताको देते हो, यह कर्मकाण्डपर विश्वास रखनेका प्रमाण है, परन्तु महापुण्योंके उदयसे जब ब्रह्मका साक्षात्कार होता है और यह सब प्रपंच तुमसे अभिन्न दीखने लगता है, तब तुम क्यों कर्मों का फल देते हो? अर्थात् नही देते तब कर्मकांडप्रतिपादक कथा असिद्ध हो जाती है ॥३०॥ ज्ञानहीन अविचारी पुरुष ही पूजा यज्ञ आदि बाह्य कर्मोंसे शिव संतुष्ट होते है ऐसा कहते है परन्तु यह ठीक नही कारण कि जो अमूर्त परिमाणरहित और अनन्त है उसको भोगकी इच्छा नही होती ॥३१॥ इसी प्रकार किंचित बेलपत्रवा चुल्लभर जल से प्रीतिसे आपको देता है वह प्रीतिसे स्वीकार करके आप उसे स्वराज्यपद देते हो यह भी माया से कल्पित है ऐसा मेरा निश्चय है ॥३२॥ तुमही एक पुराण पुरुष सम्पूर्ण दिशा बिदिशा और विश्वमें व्याप्त हो, इस जगत् के नाश होनेमें भी तुम्हारी हानि नही हो सकती, जिस प्रकार घटके नाश होनेसे घटमे व्यापी आकाशकी हानि नही हो सकती, इसी प्रकार जगत् के नाशसे तुम्हारी कुछ हानि नही ॥३३॥ जिस प्रकार आकाशमें एकही सूर्यका बिंब जल भरेहुए छोटे पात्रोमें अनेक बिंबत्वको प्राप्त होता है अर्थात् अनेकरूप दीखते है इसी प्रकारसे आप एके होकर भी सबके अन्त:करणमें अनेकरूपसे विराजते हो ॥३४॥ संसारके उत्पत्ति पालन और नाश होनेमे भी तुम्हारा कुछ कर्तव्य नही है केवल अनादि सिद्ध देहधारियोंके कर्मानुसार स्वप्नवत् तुम सब कार्य करते हो, जीव ईश्वरमें केवल बिम्ब और प्रतिबिंबकी समान अन्तर है ॥३५॥ हे शंभो ! स्थूल और सूक्ष्म दोनों जड़ देहोंमे आत्मतत्वके सिवाय दूसरा चैतन्य अंश नही है, हे पुरमथन ! सुख दुःख जो दोनों देहको होते है उनकी कहनेवाली श्रुति केवल आपमें आरोप करती है, वास्तविक नही ॥३६॥ हे भगवन् ! सच्चिदानन्दरूप समुद्रमें हंसरूप नीलकण्ठ कालस्वरूप भक्तजनोंके सम्पूर्ण पातक दूर करनेवाले और सबके साक्षी आपके वास्ते नमस्कार है ॥३७॥ सूत उवाच ।