भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 44 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 16

सूतजी बोले, इस प्रकार विश्वेश्वरको प्रणाम कर, हाथ जोड़ विस्मित हो रामचन्द्र परमेश शिवजीसे बोले ॥३८॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्र बोले, हे विश्वात्मन् ! यह अपना विश्वरूप आप उपसंहार करिये । हे शंकर ! आपके अनुग्रहसे आपमें एकत्र स्थित सब जगतको देखकर मुझे प्रतीति हुई ॥३९॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान बोले, हे महाभुज ! रामचन्द्र ! देखो मुझसे दूसरा कोई नही है । सूत उवाच । सूतजी बोले - ऐसा कहकर शिवजीने अपने देहमें से देवादिकों को गुप्त किया, अर्थात् विश्वरूप छिपा लिया ॥४०॥ आंख खोल फिर जो रामचन्द्र प्रसन्न होकर देखते है इतने ही समयमें पर्वत के श्रृंगपर व्याघ्रचर्मपर स्थित पंचमुख नीलकण्ठ त्रिलोचन शिवजीको देखा ॥४१॥ जो व्याघ्रचर्मका वस्त्र ओढे, शरीरमें विभूति लगाये है, सर्पके कंकण पहरे, नागका यज्ञोपवीत धारे ॥४२॥ व्याघ्रचर्मका ही वस्त्र ओढे बिजलीकी समान पीली जटा धारे इकले मस्तकपर चन्द्रमा धारे श्रेष्ठ भक्तोंके अभय देनेहारे ॥४३॥ चार भुजा शत्रुनाशक परशा धारण किये मृग हाथमें लिये सब जगत् के पति शिवजीको देख उनकी आज्ञामें मन लगाये प्रणाम करके रामचन्द्र स्थित हुए ॥४४॥ तब शिवजी रामचन्द्रसे बोले जो जो तुम्हारे पूछने की इच्छा है वह तुम सब पूछो । हे राम! मेरे सिवाय दूसरा कोई तुम्हारा गुरु नही है ॥४५॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्म० योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे विश्वरूपदर्शनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥



अध्याय ८ श्रीरामचन्द्र बोले, पंचभूतके देहकी उत्पत्ति स्थिति नाश किस प्रकारसे होता है और इसका स्वरूप क्या है, हे भगवन्! विस्तारपूर्वक आप मुझसे कहिये ॥१॥ श्रीभगवान बोले - पृथ्वी आदि पंचभूतसे बना हुआ यह शरीर देह है, इसमें पृथ्वी प्रधान है और दूसरे चार इसमें मिले हुए अर्थात् सहकारी है ॥२॥ जरायुज, अंडज, स्वेदज और उद्भिज्ज यह पांचभौतिक देहके चार भेद है ॥३॥ और मानसिक उत्पत्ति जो कहाती है वह पांचवी है उसे दैवसर्ग कहते है, उन चारोंमें जरायुज प्रधान है, सो प्रथम उसीका वर्णन करते है ॥४॥ स्त्रीके रज पुरुषके बीजसे जरायुजकी उत्पत्ति होती है जिस समय ऋतुकालमें स्त्रीके गर्भाशयमें पुरुषका वीर्यप्रवेश होता है ॥५॥ स्त्रीका रज मिलित होता है तभी जरायुज की उत्पत्ति होती है । स्त्रीका रज अधिक होनेसे कन्या और वीर्य अधिक होनेसे पुरुषकी उत्पत्ति होती है ॥६॥ और शुक्र शोणितकी समान होने से नपुंसक होता है, जब स्त्री ऋतुस्नान कर चुके तब चौथे दिनसे सोलह रात्रितक ऋतुकालकी अवधि कही है ॥७॥ उसमें विषम दिन पांचवे सातवे नववें दिनमें स्त्री और युग्म दिनमें पुरुषकी उत्पत्ति होती है ॥८॥ जो सोलहवी रात्रिमें स्त्रीके गर्भ रहता है, तो चक्रवर्ती राजा उत्पन्न होता है इसमें संदेह नही ॥९॥