शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऋतुमें स्नान करके जो स्त्री कामातुर हो जिस पुरुष का मुख देखती है, उसी आकृति का गर्भ होता है, इसी कारणसे स्त्री उस दिन स्वामी का मुख देखेँ ॥१०॥ स्त्रीके उदरमें एक पेशी चमडा निर्मित होता है उसे जरायु कहते है, जिस कारणसे शुक्र और शोणितका योग उसी गर्भमें होता है इसी कारणसे उसे जरायुज कहते है ॥११॥ सर्प और पक्षी आदि जीव अंडज कहलाते है, मशकादि स्वेदज कहलाते है, वृक्षगुल्मादि उद्भिज्ज कहाते है, और देवर्षि आदि मानसिक कहाते है ॥१२॥ अपने पूर्वजन्मके कर्मवशसे यह प्राणी स्त्रीके गर्भाशयमें प्राप्त होकर शुक्र शोणितके मिलनेसे प्रथममासमें शिथिल रहता है ॥१३॥ कछ दिनोंमें उसकी बुदबुदकी आकृति होने लगती है, कछ दिनोंमें जेरसी होती है, इस कारण उसमें दहीकी समान कुछ गाढापन आता है फिर कुछ दिन में उसकी पेशी (मांसपिंड) बनती है । इस प्रकार शुक्र शोणित संयोग होते हुए एकमास हो जाता है, दूसरे मासमेंमासपिंड बनता है ॥१४॥ तृतीयमासमें शिर, हाथ आदि उत्पन्न होते है, और जीवका आश्रय लिंगदेह चौथे महीनेमें उत्पन्न होता है ॥१५॥ तब यह गर्भ माताके उदरमें चलायमान होने लगता है । पुत्र दक्षिणपार्श्व और कन्या वामपार्श्वमें स्थित होती है ॥१६॥ और नपुंसक उदरके मध्यभागके स्थित होता है । इस कारण दक्षिणापार्श्वमें जन्म लेनेके अनन्तर होनेवाले श्मश्रु तथा दन्तादिको छोड़कर सब अंग प्रत्यंग के भाग ॥१७॥१८॥ एक साथ चौथे मासमें हो जाते है, पुरुषोंके गंभीरता स्थिरादि धर्म और स्त्रियों के चञ्चलतादि धर्म चौथेमासमें उत्पन्न हो जाते है जो सूक्ष्मरूपसे रहते है ॥१९॥ और नपुंसक गर्भके स्त्री पुरुषोंके मिले हुए धर्म गर्भमें उत्पन्न होते है और माताके हृदयमें सन्निकटही इसका हृदय होकर जिस वस्तुकी माताँ इच्छा करतीँ है उसी वस्तुकी यह इच्छा करता है इस कारण गर्भकी वृद्धिके निमित्त माताकी इच्छा पूर्ण करनी चाहिये और इसीसे गर्भवती स्त्रीकों दोहदवती अर्थात दो हृदयवाली कहते है ॥२०॥२१॥ और उसकी इच्छा पूर्ण न होने से गर्भमें निर्बलता, बुद्धिहीनता व्यंगतादि दोष हो जाते है । और माताका जिन विषयोंमें चित्त होता है उन विषयोंमें ही आर्त वह पुरुष होता हैं, इसलिये गर्भिणीकी इच्छा पूर्ण करे ॥२२॥ पांचवे महीनेसे चित्त बढ़ता है तथा मांस और रक्तकी पुष्टि होती है, छठे महीनेमें, अस्थि स्नायु और नख मस्तकके केश तथा शरीरके लोभ प्रगट होते है ॥२३॥ सातवें मासमें बल शरीरका वर्ण तथा सब अवयवोंकी पूर्णता होती है और वह गर्भका बालक घुटनोंमें कोनी धर हाथोंसे कान ढक ॥२४॥ और गर्भवाससे व्याकुल होकर भयभीत हुआसा स्थित होता है ॥२५॥ उस समय इसको अनेक जन्मो की सुधि हो जाती है तब बड़ा दुःखी होता है और हा! कष्टकी बात है ऐसे कहता हुआ दुःखी होता है अपने आत्माको शोचता है ॥२६॥ वह असह्य और मर्मभेदी यातना को प्राप्त होकर बारंबार कष्ट पाता है जिस प्रकार से तपायें रेतमें उसीको डाल दो उसको जो वेदना होती है ऐसी वेदनाको वह प्राप्त होता है और दुःख भोगता है ॥२७॥ गर्भवासके दुःख यह है प्रथम गर्भवासकी अग्निसे (जो जठराग्नि कहाती है) सन्तप्त होकर कहता है कि यह ज्वाला मुझको अत्यन्त पीडित करती है ॥२८॥ इसी प्रकार उदरके कीए जब काटते है तो विदित होता है कि इनके मुख कूटशाल्मलिके काटेकी समान तीक्ष्ण है और यह मुझको अत्यन्त पीड़ित करते है ॥२९॥ गर्भकी बड़ी भारी दुर्गन्ध और जठराग्निकी ज्वालासे जो मुझको दुःख प्राप्त हुआ है, उससे कुम्भीपाक नरकका दुःख कम है ॥३०॥ मवाद, रक्त, कफ, अमंगल, पदार्थही पान करने और वांति भक्षण करने को मिलती है, अशुचि पदार्थ मल मूत्रादिमें रहनेसे गर्भमें स्थित प्राणी कीड़ाही हो जाता है ॥३१॥ जो दुःख गर्भशय्यामें सोकर मैने पाया है यह दुःख सम्पूर्ण नरकोंमें भी पडकर प्राप्त नही होता ॥३२॥ इस प्रकार से पूर्वकालमें प्राप्त हुई अनेक प्रकारकी यातनाओंको स्मरण करता हुआ मुक्त होनेका उपाय सोचता यही अभ्यास करता रहता है ॥३३॥