भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

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आठवे महीनेमे त्वचा और श्रुति प्राप्त होती है । इसी प्रकार ओज इन्द्रियशक्ति और तेज शरीरके आरम्भ करनेहारे तथा धातुपरिणामसे होनेहारे हृदयकै तेज जो जीवनके मुख्य कारण है वह प्राप्त होते है ॥३४॥ कुछ समयतक अतिशय चंचल होनेके कारण किसी समय माताके हृदयमें चंचलरूपसे रहता है, कभी गर्भाशयमें चपलता कौ प्राप्त हो जाता है । इसी कारण अष्टम मासमें उत्पन्न हुआ बालक बहुत नही जीता कारण कि वह ओज और तेजसे हीन होता है ॥३५॥ फिर नौवें मासमें प्रसूतिका समय होता है परन्तु शीघ्र प्रसव होनेका प्रतिबंधक यह है कि, जो कुछ गर्भके प्रारब्ध कर्म हुए तो उसे और कुछै कालतक गर्भमें रहना पड़ता है ॥३६॥ माताकी एक रक्तवाहिनी नाडी नाबिचक्रकी एक नाडीसे मिली हुई है, उसीके द्वारा माताका भक्षण किया अन्न गर्भमें पहुँचता है, इस प्रकार माताके आहारसे पुष्टिको प्राप्त हो यह गर्भ उसीके द्वारा जीवित रहता है ॥३७॥ योनिचक्रमैं इसके सम्पूर्ण अंग अस्थियोंसे पिचकर व्यथित होते है, तब यह प्रथम कुक्षिसे निकलकर योनिए बाहर आता है, उस समय उसका शरीर मेदा रुधिर से लिप्त और जरायुसे आच्छादित रहता है ॥३८॥ यह प्राणी अत्यन्त दुःख से पीड़ित हो नीचेको मुखकर जैसेही योनिचक्रसे निकलता है वैसेही ऊंचे स्वरसे रोता है, इस प्रकार गर्भवास के यन्त्रसे निकलकर दुःखी भोगता है, कही सुख नही मिलता ॥३९॥ जन्म लेकर यह कुछ भी नही कर सकता, केवल मांसके पिंडकी समान पड़ा रहता है, तब इसके मातापिता दंड हाथमे लिये कुत्ते बिलावें तथा डाढवाले जन्तुओंसे इसकी रक्षा करते है ॥४०॥ उस समय यह ज्ञानशून्यही पिताकी ही समान राक्षसोको भी जानता है, पीनेको दुग्ध जानकर पीनेकी अभिलाषा करता है, तात्पर्य यह है कि बाल अवस्थाभी महाकष्टकारक है ॥४१॥ जबतक सुषुम्ना नाडी कफसे आच्छादित रहती है तबतक स्फुट अक्षर और वचन बोलनेको वह समर्थ नही होता ॥४२॥ इसी कारणसे यह गर्भमेभी नही रो सकता ॥४३॥ पीछे युवा अवस्थाके आनेसे कामदेवके ज्वरसे विह्वलहो अकस्मात ही कभी कुछ गाता है कभी अपना पराक्रम कहने लगता है ॥४४॥ कभी अभिमानसे वृक्षों पर चढता, कभी शान्त प्राणियोंको उद्वेजित करता, कभी काम क्रोधके मदसे अन्धा हो किसीको भी नही देखता ॥४५॥ अस्थि मांस और नाडी इनके सिवाय स्त्रीके मन्मथ स्थानमें और क्या है जिसमें कि मेंढकके फाड़े हुए पेटकी समान दुर्गन्ध आती है परन्तु तथापि उसमें आसक्त हुआ कामबाण से पीड़ित हो अपने आत्मा को अत्यंत जलाता है ॥४६॥ अस्थि मांस शिरा और त्वचा इसके सिवाय स्त्री के शरीर में और क्या है जो यह पुरुष स्त्रियोंमें आसक्त होकर मायसे मूढ़ होनेके कारण जगत् में कुछ भी नही देखता ॥४७॥ एक समय प्राणपवन निर्गत हो जाने से भी मृगकेसे नेत्रवालीका यह देह व्यर्थता को प्राप्त होता है और पांच छः दिन बीतनेपर फिर वह देह दीखता भी नही ॥४८॥ इस प्रकार युवावस्थामैं दुःख भोगने उपरांत वृद्धावस्थाका दुःख प्रारंभ होता है तब यह महानिरादरके स्थान जराको प्राप्त होकर महादुःखी होता है, इसका हृदय कफसे व्याप्त हो जाता है और खाया हुआ अन्नभी जीर्ण नही होता ॥४९॥ दांत गिर पडते है, दृष्टि मंद हो जाती है, तथा अनेक प्रकारके रोग होनेके कारण कटु तिक्त कषाय औषधियोंका सेवन करता है वायुसे कमर टेढी हो जाती है, कटि गर्दन हाथ जंघा चरण यह निर्बल हो जाते है ॥५०॥ तब सहस्त्रों रोग इसके शरीरमें लिपट जाते है बंधु तिरस्कार करते है (दोहा-सींग झडे और खुर घिसे, पीठ बोझ नहि लेय । ऐसे बूढे बैलको, कौन बांध भुस देय) तबैं यह पवित्रतारहित ही मलसे व्याप्त शरीर हौनेके कारण नखशिखपर्यन्ते सब शरीरोंसे सन्तप्त होता है ॥५१॥ तथापि ईश्वरका ध्यान नही करता और शय्या श्रेष्ठ भोजन आदि दुर्लभ भोगोंका ध्यान करता हुआ स्थित होता है इसके हाथ पैर कांपने लगते है, सब इन्द्रियोंकी शक्ति कुंठित हो जाती है और कोई सामर्थ्य न रहनेके कारण बालक भी इसकी हँसी करते है ॥५२॥ फिर इसके आगे मरणकालके दुःखका तो कोई दृष्टान्त ही नही, दरिद्रादि पीड़ा रोगादि पीड़ा कितनी ही प्राप्त हो उसको कुछ न गिनकर एक मरणके भयसे सबही भयभीत होते है ॥५३॥ बंधुओंसे घिरे हुए प्राणी को मृत्यु ले जाती है जिस प्रकार समुद्रमें प्राप्त हुए सर्पको गरुड ले जाता है ॥५४॥ हा प्रिये! हा धन! हा पुत्रो! इस प्रकार दारुण विलाप करते हुए इस पुरुषको मृत्यु इस प्रकार ले जाता है जैसे सर्प