भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 44 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 11

॥३६॥ मै ही एक जगत् की मृत्यु का भी मृत्युस्वरूप हूँ, हे राजन्! मै ही इस चराचर जगत् का भक्षण करनेवाला हूँ ॥३७॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे रामाय वरप्रदानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ वे युद्धदुर्मद सब राक्षस तो मेरे मुखमें प्राप्त हो चुके है तुम निमित्तमात्र होकर संग्राममें कीर्ति पाओगे ॥३८॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे रामाय वरप्रदानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥



अध्याय ६ श्रीरामचन्द्र बोले, हे भगवन् ! आप कहते हो कि मै ही जगत्की उत्पत्ति और पालन करता हूँ इसमें मुझे बड़ा आश्चर्य है । स्वच्छ स्फटिक मणिकी समान जिनका शरीर और तीन नेत्र तथा मस्तकपर चन्द्रमा है ॥१॥ ऐसे आप परिच्छिन्न और पुरुषाकृति मूर्ति धारण किये हो और पार्वती सहित प्रमथ आदि गणों के साथ यही विहार करते हो ॥२॥ फिर तुमने पंचभूतादि यह चराचर जगत् कैसे उत्पन्न किया है । हे गिरिजापते! जो आपकी मुझपर कृपा है तो आप कहिये ॥३॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान बोले- हे महाभाग रामचंद्र! सुनो, जो देवताओंकी भी बुद्धिमें नही आता वह से यत्नपूर्वक तुमसे कहता हूँ, जिससे तुम अनायास ही संसार के पार हौ जाओगे ॥४॥ जो कुछ यह पाँच महाभूत, चौदह भुवन, समुद्र, पर्वत, देवता, राक्षस और ऋषि दीखते है ॥५॥ १ चौदहभुवन भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यं यह सात ऊपरके लोक, अतल, वितल, सुतल, रसातल,तलातल, महातल और पाताल यह सात अधोलोक मिलकर चौदह लोक हुए । तथा और स्थावर जंगम, गन्धर्व, प्रमथ और नाग दीखते है यह सब मेरी विभूति है ॥६॥ प्रथम ब्रह्मादि देवता मेरा रूप देखनेके निमित्त मेरे प्रिय मंदराचल पर गये ॥७॥ देवता हाथ जोड मेरे आगे स्थित हुए तब मैने देवताओं को लीलासे व्याकुलचित्त जानकर उन ब्रह्मादि देवताओका ज्ञान हरलिया ॥८॥ वे तत्काल ही ज्ञानरहित हो हमसे बोले तुम कौन हो? तब मैने देवताओँसे कहा मै ही पुरातन हूँ ॥९॥ हे देवताओं! सृष्टिसे पहिले मै ही था, वर्तमानमें भी मै ही हूँ और अन्तमें भी मै ही रहूँगा । इस लोकमें मेरे सिवाय और कुछ नही ॥१०॥ हे सुरेश्वरो! मुझसे व्यतिरिक्त और कुछ वस्तु नही है ॥ नित्य अनित्य भी मै ही हूँ तथा मै ही पापरहित वेद और ब्रह्मौका भी पति हूँ ॥११॥ मै ही दक्षिण उत्तर पूर्व पश्चिम हूँ । हे सुरेश्वरो! ऊपर नीचे दिशा विदिशा सब मै ही हूँ ॥१२॥ सावित्री, गायत्री, स्त्री, पुरुष, नपुंसक, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप् और पंक्ति छन्दभी मै ही हूँ, तथा मै ही तीनो वेदोंमे वर्णन किया गया हूँ ॥१३॥ मै ही सत्यस्वरूप मायाके विकास से रहित हूँ, सब प्रकार शांत दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य, आहवनीय तीन अग्निस্বরূপ हूँ, गौ, गुरुमें गुरुता, वाणीका रहस्य, स्वर्गे और जगत् का पति मै ही हूँ ॥१४॥ मै ही सबसे ज्येष्ठ सब देवताओं से श्रेष्ठ ज्ञानियोंमें पूज्य सब जलोंका पति सागर मै ही हूँ । मै ही अर्चा के योग्य षड्गुण ऐश्वर्यसम्पन्न तेजः स्वप्न और उसकी आदिवायु भी मै ही हूँ ॥१५॥ मै ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और श्रेष्ठ अंगिरस अथर्ववेद हूँ मै ही स्वयम्भू हूँ ॥१६॥