भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

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इसके उपरान्त रामचन्द्रको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस और महापाशुपतास्त्र प्रदान किया ॥१३॥ और रामचन्द्रसे बोले, हे राम! यह मेरा उग्र अस्त्र जगत्का नाश करनेवाला है ॥१४॥ इस कारण सामान्य युद्धमें इसका प्रयोग नही करना । इसका निवारण करनेवाला त्रिलोकीमें दूसरा नही है ॥१५॥ इस कारण हे राम! प्राणसंकट उपस्थित होनेपर इसका प्रयोग करना उचित है, दूसरे समयमें इसका प्रयोग करनेसे जगतका नाश हो जाता है ॥१६॥ फिर शिवजी देवताओंमें श्रेष्ठ लोकपालों को बुला प्रसन्न मन हो बोले, रामचन्द्रको सब कोई अपने २ अस्त्रप्रदान करो ॥ १७॥ यह रामचन्द्र उन अस्त्रोंसे रावणको मारेंगे कारण कि, उसको मैने वर दिया है कि, तू देवताओं से न मरेगा ॥१८॥ इस कारण तुम सब युद्धमें भयंकर कर्म करनेवाले वानरों का शरीर धारण करके इनकी सहायता करो इससे तुम सुखी होगे ॥१९॥ शिवजीकी आज्ञा को शिरपर धर प्रणामकर हाथ जोड देवताओंने शिवजीके चरणों में प्रणाम कर अपने २ अस्त्र दिये ॥ २०॥ विष्णुने नारायणास्त्र, इन्द्रने ऐन्द्रास्त्र, ब्रह्माने ब्रह्मदण्डास्त्र, अग्निने आग्नेयास्त्र दिया ॥२१॥ यमराजने याम्यास्त्र, निऋतिने मोहनास्त्र, वरुणने वरुनास्त्र, वायुने वायव्यास्त्र ॥२२॥ कुबेरने सौम्यास्त्र, ईशानने रुद्रास्त्र, सूर्यने सौरास्त्र, चन्द्रमाने सौम्यास्त्र, विश्वेदेवाने पार्वतास्त्र, आठों, वसुओंने वॉसवास्त्र प्रदान किया ॥२३॥ तब दशरथकुमार रामचन्द्र प्रसन्न हो शिवजीको प्रणाम कर हाथ जोड़ खडे हो भक्तिपूर्वक बोले ॥२४॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्र बोले, हे भगवन् ! मनुष्यों से तो क्षारसमुद्र उल्लंघन नही किया जायेगा और लंकादुर्ग देवता तथा दानवों को भी दुर्गम है ॥२५॥ और वहां करोड़ो बली राक्षस रहते है वे सब जितेन्द्रिय वेदपाठ करने में तत्पर और आपके भक्त है ॥२६॥ अनेक प्रकारकी मायाके जानने हारे बुद्धिमान अग्निहोत्री है । केवल मै और भ्राता लक्ष्मण युद्धमें उनको कैसे जीतसकेंगे ॥२७॥ श्रीमहादेव उवाच । शिवजी बोले - हे रामचन्द्र ! रावण और राक्षसोंके मारनेमें विचार करने की कुछ आवश्यकता नही, कारण कि उसका काल आगया है ॥२८॥ वे देवता और ब्राह्मणका दुःख देनेरूपी अधर्ममें प्रवृत्त हुए है सुव्रत! इस कारण उनकी आयु और लक्ष्मीका भी क्षय हो गया है ॥२९॥ उसने राजस्त्री जानकीजी की अवमानना की है । इस कारण तुम उसे सहज में मार सकोगे, कारण कि वह इस समय मद्यपानमें आसक्त रहता है ॥३०॥ अधर्ममें प्रीति करनेवाला शत्रु भाग्यसे ही प्राप्त होता है । जिसने वेदशास्त्र पढा हो और सदा धर्ममें प्रीति करता हो वह विनाशकाल आने पर धर्मकाँ त्याग कर देता है ॥३१॥ जो पापी सदा देवता, ब्राह्मण और ऋषियों को दुःख देता है, उसका नाश स्वयं होता है ॥३२॥ हे राम ! किष्किंधा नामक नगरमें देवताओंके अंशसे बहुतसे महाबली और दुर्जय वानर उत्पन्न हुए है ॥३३॥ वे सब तुम्हारी सहायता करेंगे । उनके द्वारा तुम सागरपर सेतु बंधवाना अनेक पर्वत पर लाकर वे वानर पुल बांधेगे उसपर सँब वानर उतर जायेंगे । इस प्रकार रावणको उसके साँथियों सहित मारकर वहां से अपनी प्रियाको लाओ ॥३४॥ जहां संग्राममें शस्त्रसे ही जय प्राप्त होनेकी संभावना हो वहां अस्त्रोंका प्रयोग न करना और जिनके पास अस्त्र नही है अथवा थोडे शस्त्र है तथा जो भाग रहे ऐसे पुरुषोके ऊपर दिव्यास्त्रका प्रयोग करनेवाला स्वयं नष्ट हो जाता है ॥३५॥ बहुत कहने से क्या है यह संसार जो मेरा ही उत्पन्न किया है, मै ही इसका पालन और मै ही इसका संहार करता हूँ