भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

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दक्षिणकी ओर पर्वतके समान मुषकपर चढ़े गणेशजी और उत्तरकी ओर मयूर पर चढ़े कार्तिकेय ॥४४॥ महाकाल और चण्डेश्वर पार्षदगण सेनानायक भयंकर मूर्ति धारे इधर उधर स्थित दावाग्नि की समान दीप्तिमान दुर स्थित कालाग्नि रुद्र ॥४५॥ तीन चरण है जिसके और कुटिल मूर्तिवाले प्रमथ गण तथा उनके अग्रभागमें नृत्य करनेवाले भृंगिरिटि ऐसे अनेक मूर्तिवाले करोड़ों प्रमथगण ॥४६॥ और अनेक प्रकारके वाहनोंपर स्थित चारो ओर मातृमण्डल और पञ्चाक्षरी विद्या जपनेमें तत्पर सिद्ध विद्याधरादिक ॥ ४७॥ और दिव्य रुद्रके गीत गाते हुए किन्नरोंके समूह और (त्र्यम्बक यजामहे) इस मंत्र को जपनेहारे ब्राह्मणोंके समूह ॥ ४८॥ आकाशमें वीणा बजाकर गाते और नाचते हुए नारद और नाट्यकी विधिसे नृत्य करते हुए रम्भादिक अप्सराओंके झुण्ड ॥४९॥ और गानेमें तत्पर चित्ररथदि गन्धर्वोंके समूह तथा शिवजीके कानोंमें कुण्डलताको प्राप्त हुए कम्बल और अश्वतर नाग ॥५०॥ तथा गीत गानेमें तत्पर कम्बल और अश्वतरनागोंसे शोभित सब देवसभाको देखकर रामचन्द्र कृतार्थ हुए ॥५१॥ और हर्षसे गद्गदकण्ठ हो शिवजी की स्तुति और दिव्य सहस्रनामके उच्चारणसे बारंबार प्रणाम करने लगे ॥५२॥ इति श्रीपद्मपुराणान्तर्गतशिवगीतायां भाषाटीकायां शिवप्रादुर्भावो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ अध्याय ५ श्रीसूतजी बोले-इसके उपरान्त उस स्थानमें एक सुवर्णका बड़ा रथ प्रादुर्भूत हुआ जिसकी अनेक रत्नोंकी कान्तिसे सब दिशो चित्र विचित्र हो गई थी ॥१॥ नदी के किनारेकी पंकमें जिसके चारो चक्र स्थित थे, मोतियोंकी झालर और सैकड़ो श्वेत छत्रसे युक्त ॥२॥ सुवर्णके खुरमढे हुए चार घोडोंसे शोभित मोतियोंकी झालर और चंदोवेसे शोभायमान जिसकी ध्वजामें वृषभका चिह्न था ॥३॥ जिसके निकट एक मत्त हस्तिनी चलती थी, जिसपर रेशमकी गद्दियाँ बिछाई थी, पांच भूतोंके अधिष्ठातृ देवताओंसे शोभित पारिजात कल्पवृक्षके फूलोंकी मालाओंसे सज्ज्त ॥४॥ मृगनाभिसे उत्पन्न हुई कस्तूरीके मदवाला कपूर और अगर धूप की उठी हुई गन्धसे भौंरों को आकर्षण करनेवाला ॥५॥ प्रलयकालके समान शब्दायमान अनेक प्रकार के बाजोंसे युक्त वीणावेणु मधुर बाजे और किन्नरो गणों से युक्त ॥६॥ इस प्रकारके श्रेष्ठरथको देखकर वृषभसे उतर शिवजी पार्वती सहित वस्त्रकी शय्यावाले उस रथके स्थानमें प्रविष्टित हुए ॥७॥ उसमें देवांगना श्वेत चमर और व्यजनके चलानेसे शिवजीको प्रसन्न करने लगी ॥८॥ शब्दायमान कंकणोकी ध्वनि और निर्मल मंजीरीके शब्द वीणावेणु के गीतसे मानों त्रिलोक पूर्ण हो गया ॥९॥ तोतोंके वाक्यकी मधुरता और श्वेत कबूतरोंके शब्दसे जगत शब्दायमान हो गया, प्रसन्नतासे अपने फण उठाये हुए शिवजीके भूषणरूप शरीरमें लिपटे सर्पोंको देखकर करोड़ो मयूर प्रसन्न हो अपनी चन्द्रका दिखाते हुए नृत्य करने लेगे ॥ १०॥ तब शिवजी प्रणाम करते हुए रामको उठाकर प्रसन्न मनसे दिव्य रथमें ले आये ॥११॥ और अपने दिव्य कमण्डलुके जलसे सावधान हो आचमनकर रामचन्द्रको आचमन कराय अपनी गोदमें बैठाया ॥१२॥