शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजाते है ॥१८॥ तब एक क्षणमात्रमें धनुष जलकर रामचन्द्रके हाथसे गिरा फिर तरकस अंगुलित्राण (जो अंगुलियोंमें पहनते है) गोधा जो प्रत्यञ्चाके आघातसे रक्षा करता है (यह चर्मके बने होते है) जलकर गिर पडे ॥१९॥ यह देखकर लक्ष्मण भयभीत और मूर्छित हो पृथ्वीमें गिरे और रामचन्द्र भी निस्तब्ध हो केवल घुटनेसे पृथ्वी में बैठ गये ॥२०॥ और आँखे मीचे भयभीत हो शंकरकी शरण को प्राप्त हुए और ऊँचे स्वरसे शिवसहस्त्रनामका जप करने लगे ॥२१॥ और शिवजीको पृथ्वीमें दण्डप्रणाम बारम्बार किया, फिरभी प्रथमकी समान दिङ्मण्डलको शब्दायमान करनेवाला शब्द हुआ ॥२२॥ उस घोर शब्दसे पृथ्वी चलायमान और पर्वत कंपित हुए तब फिर क्षणमात्रमें वह तेज चंद्रमाके समान शीतल हुआ ॥२३॥ जितनेमें रामचंद्र नेत्र खोलकर देखते है तब तक ही उन्होने संपूर्ण भूषण धारण किये वृषभ का दर्शन किया ॥२४॥ जिसका रंग अमृतके मंथनेसे उत्पन्न हुए मक्खनके पिंडकी नाई श्वेत है, जिसके श्रृंगाग्रमें सुवर्णमें बंधी मरकत मणि शोभित होती है ॥२५॥ नीलमणिके समान नेत्र ह्रस्वकण्ठसामासे भूषित रत्नोंकी खोगीर से शोभित जो कि श्वेत चामरों से युक्त है ॥२६॥ घरघर शब्दवाली घंटिकाओंसे दशों दिशाओंको पूर्ण करते हुए वृषभपर चढे स्फटिक मणि के समान शुभ्रकांति महादेवजी ॥२७॥ जो कि, करोड़ों सूर्यकी समान प्रकाशमान, करोड़ों चन्द्रमाओंके समान शीतल, व्याघ्र चर्मका वस्त्रधारे, नागोंका यज्ञोपवीत पहरे ॥२८॥ सम्पूर्ण अलंकारोंसे युक्त, बिजलीकी समान पीली जटा धारे, नीलकण्ठ, व्याघ्रका चर्म ओढे, चन्द्रमा मस्तकपर विराजमान ॥२९॥ अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे युक्त, दश बाहु, तीन नेत्र, युवावस्था पुरुषोंमें श्रेष्ठ, सच्चिदानन्दस्वरूप ॥३०॥ तथा निकट बैठी हुई पूर्ण चन्द्रमुखी, नीलकमल के समान अथवा मरकत मणिके समान सुन्दर शरीरवाली ॥३१॥ मोतियोंके आभरणोंसे युक्त, तारोंसे युक्त रात्रिकी, समान शोभित तथा विन्ध्यपर्वतकी समान ऊँचे स्तनभार से नम्र ॥ ३२॥ है वा नहीं ऐसे संदिग्ध मध्यभाग में सुन्दर है वस्त्र जिसका और दिव्य आभूषणोंसे युक्त कस्तूरी आदि दिव्य सुगन्ध लगाये ॥३३॥ दिव्य माला धारे, नील कमलके समान नेत्र, टेढे केशोंसे शोभित मुखमें ताम्बूल खाने से शोभित अधरोष्ठवाली ॥३४॥ शिवजीके आलिंगनसे उत्पन्न हुए रोमांच शरीरवाली सच्चिदानन्द रूप त्रिलोकीकी माता ॥३५॥ सब सुन्दर पदार्थोंके सारकी मूर्तिमान पात्र पार्वतीको रामचन्द्रने देखा । इसी प्रकार अपने २ वाहनपर चढ़े आयुध हाथमें लिये ॥३६॥ बृहद्रथन्तरादि सामगायन करते अपनी २ स्त्रियोंसे युक्त इन्द्रादि दिक्पालोंसे सेवित ॥३७॥ और सबसे आगे गरुडपर चढे, शंख, चक्र, गदा और पद्म धारे, नील मेघके समान शरीरधारी, बिजलीके समान कान्तिमान, लक्ष्मीसे युक्त ॥३८॥ एकाग्र चित्तसे रुद्राध्यायका पाठ करते हुए जनार्दन और पीछे हंसपर चढे हुए चतुर्मुख ब्रह्माजी ॥३९॥ चारो मुखों से ऋक यजुः साम और अथर्व इन चारो वेद तथा रुद्रसूक्तका जप करते बड़ी दाढी और जटा धारण किये सरस्वती सहित महेश्वरकी स्तुति करते ॥४०॥ इसी प्रकार अथर्वशीर्ष के मंत्रो से स्तुति करते हुए मुनिमन्डल और गंगादि नदियोंसे युक्त नीलवर्ण सागर ॥४१॥ श्वेताश्वतर के मंत्रोसे शिवजीको स्तुति करते कैलास पर्वतके समान अनन्तादि महानाग ॥४२॥ रत्नोंसे विभूषित कैवल्य उपनिषद् पाठ करनेहारे स्तुति कर रहे है और सुवर्णकी छड़ी हाथमें लिये नंदीके आगे स्थित हुए ॥४३॥