शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयाऽध्यायः ॥३॥ उसके बिना पाये दानवोंसे जय पाना बडा दुर्लभ है । इस कारण इस अस्त्रके पानेके निमित्त शिवजीकी शरण जाओ ॥ ३५॥ इति श्रीपद्मपुराणे० अगस्त्यराघवसंवादे शिवगीताभाषाटीकायां तृतीयोध्यायः ॥३॥
अध्याय ४ सूतजी बोले – अगस्त्यजी जब ऐसा कहकर आश्रम को चले गये तब रामगिरिके ऊपर गोदावरीके पवित्र आश्रममें रामचन्द्र ॥१॥ शिवलिंग का स्थापन कर अगस्त्यजीके उपदेशानुसार विरजादीक्षा ले सर्वांग में विभूति लगाय रुद्राक्ष के आभरण पहर ॥ २॥ शिवलिंगको गोदावरीके पवित्र जलोंसे अभिषेकित कर वन के उत्पन्न हुए फूलों और फूलों से उनका पूजन कर ॥३॥ भस्म लगाये भस्मपरही शयन करते व्याघ्रचर्म के आसनपर बैठे रातदिन अनन्य बुद्धिकर शिवसहस्त्रनाम जपने लगे ॥ ४॥ एक महीने तक फलाहार, एक महीने तक पात्तों का भोजन, एक महीना जलपान और एक महीना पवन को आहार करे ॥५॥ शान्त अन्तःकरण, इन्द्रियोंको जीते, प्रसन्न मन, महेश्वर का ध्यान किये, हृदयकमलमें विराजमान, अर्द्धांग में पार्वतीको धारण किये ॥६॥ चार भुजा तीन नेत्र बिजली के समान पीली जटा धारे करोड़ो सूर्यके समान प्रकाशमान कोटि चन्द्रमाके समान शीतल ॥ ७॥ सम्पूर्ण गहने पहरे सर्पोंका यज्ञोपवीत व्याघ्रचर्म ओढे भक्तों के अभयदाता वरदायक मुद्रा धारे ॥८॥ व्याघ्रचर्मका ही उत्तरीय (दुपट्टा) ओढे, देवता और असुरोंसे नमस्कार पाये, पंचमुख चन्द्रमा मस्तकपर धारे, त्रिशूल और डमरू लिये ॥९॥ नित्य अविनाशी शुद्ध अक्षय निर्विकार एकरूप, शिवजीका इस प्रकार नित्य ध्यान करते चार महीने बीत गये ॥१०॥ तब प्रलयकालिक समुद्रके समान भयंकर शब्द प्रगट हुआ, जिस प्रकारसे समुद्र मंथनके समय मंदराचलके बिलोनेसे ध्वनि उठी थी ॥११॥ त्रिपुरासुरके जलानेके समय शिवजीके बाणकि अग्निके समान भयंकर महाशब्द सुनकर रामचंद्र चकित हो जबतक गोदावरीके तटोंकी ओर दृष्टि करते हैं ॥१२॥ तबतक भयंकर महातेजःपुञ्ज विप्र रामचन्द्रके आगे उपस्थित हुआ, उसी तेजसे चकित हो रामचंद्रको दशोंदिशा न सूझी ॥१३॥ हे द्विजश्रेष्ठ! आँखे मिच जानेसे राजकुमार मोहको प्राप्त हो गये और विचार करके जाना कि यह दैत्योंकी माया है ॥ १४॥ फिर वह महावीर उठकर और अपने बडे धनुष्यको चढाकर तथा दिव्य मन्त्रोंसे अभिमन्त्रितकर तीक्ष्ण बाणोंपर दृष्टि करने लगे ॥१५॥ आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, सोमास्त्र, मोहनास्त्र, सूर्यास्त्र, पर्वतास्त्र, सुदर्शनास्त्र, महाचक्र, कालचक्र, वैष्णवास्त्र ॥ १६॥ रुद्रास्त्र, पाशुपतास्त्र, ब्रह्मास्त्र, कुबेरास्त्र, वज्रास्त्र, वायवास्त्र और परशुरामास्त्र इत्यादि अनेक मन्त्रोंका रामने प्रयोग किया ॥१७॥ परन्तु उस महातेजमें वे रामचन्द्रके अस्त्र और शस्त्र इस प्रकार लीन हो गये जैसे समुद्रमें पत्थर और ओले मग्न हो