शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीसरस्वत्यै नमः ॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ ॐ अस्य श्रीशिवगीतामालामन्त्रस्य श्रीवेदव्यासरूप्यगस्त्यऋषिः ॥ जगतीच्छन्दः ॥ श्रीसदाशिवः परमात्मा देवता ॥ प्रणवे बीजम् ॥ सर्वव्यापक इति शक्तिः ॥ हीं कीलकम् ॥ ब्रह्मात्मसाक्षात्कारार्थे जपे विनियोगः ॥ अथ न्यासः ॥ ॐ श्रीवेदव्यासरूप्यगस्त्यऋषिः शिरसि ॥ ॐ जगतीच्छन्द मुखे ॥ ॐ श्रीसदाशिवः परमात्मादेवता हृदये ॥ ॐ प्रणवे बीजं नाभौ ॥ ॐ सर्वव्यापक इति शक्तिः गुह्ये ॥ ॐ हीं कीलकं पादयोः ॥ ॐ ह्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ॥ ॐ हीं तर्जनीभ्यां नमः ॥ ॐ हूं मध्यमाभ्यां नमः ॥ ॐ ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः ॥ ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ एवं हृदयादि ॥ दोहा-गौरि गिरीश गणेश रवि, शशि सहसानन राम । सबको वंदन करत हूं, सिद्ध होहि सब काम ॥१॥ सूतजी बोले हे शौनकादिको ! इसके उपरान्त अब मै शुद्ध और कैवल्यमुक्तिदायक संसारके दुःख छुड़ाने में औषधीरुप शिवगीतारत्नको शिवजीके अनुग्रहसे वर्णन करता हूँ ॥१॥ न कर्मो के अनुष्ठान न दान न तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है किन्तु ज्ञान से ही प्राप्त होता है ॥२॥ आगे शिवजी ने दण्डकवनमें रामचन्द्रको जो शिवगीता उपदेश की है वह गुप्तसे भी गुप्त है ॥३॥ जिसके श्रवण मात्र से ही मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है जो पूर्वकाल में स्कन्दजीने सनत्कुमार से वर्णन की थी ॥४॥ वह मुनिश्रेष्ठ सनत्कुमार व्यासजीसे कहते हुए व्यासजीने कृपाकरके वह हमसे वर्णन की ॥५॥ और कहा भी था कि, यह तुम गीता किसी को नही देना, हे सूतपुत्र! ऐसा वचन पालन न करने से देव क्षुभित हो शाप देते है ॥६॥ हे ब्राह्मणो! तब मैने भगवान् व्यासजी से पूछा हे भगवन् ! सब देवता क्यो क्षोभ करते और शाप देते है ॥७॥ उनकी इसमें क्या हानि है, जो वे देवता क्रोध करते है । यह सुनकर व्यासजी मुझसे बोले हे वत्स! तू अपने प्रश्न का उत्तर सुन ॥८॥ जो ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र करते और गृहस्थाश्रममें रहते है वही सब फलों के देनेहार देवताओं को कामधेनु है ॥९॥ भक्ष्य, भोज्य, पान करने योग्य, जो कुछ पर्वोमे यज्ञ किया गया है, सो हविद्वारा अग्निमें आहुती दी गई है, वह सब स्वर्ग में मिलती है ॥१०॥ देवताओंको स्वर्गमें इष्टसिद्धि देनेवाला और कुछ नही है जैसे गृहस्थी पुरुषों को दुही गई गाय ले जाने से केवल दुःखी होता है ॥११॥ इसी प्रकार ज्ञानवान ब्राह्मण देवताओंको दुःखदाता ही है कारण कि, वह कर्म नही करता इस कारण इसके विषय भार्या पुत्रादि में प्रवेश करके देवता विघ्न करते हैं ॥१२॥ इससे किसी देहधारीकी शिवमें भक्ति नही होती इस कारण मूर्खोंको शिवका प्रसाद नही मिलता ॥१३॥ और जो यथाकथञ्चित जानता भी है वह किसी कारण मध्यें ही खंडित हो जाता है और जो किसीको ज्ञान हुआ भी तो वह विश्वास नही भजता ॥१४॥ ऋषय ऊचुः । ऋषि बोले जब इस प्रकारसे देवता शरीरधारियों को विघ्न करते है तो फिर इसमें किसका पराक्रम है जो मुक्तिको प्राप्त होता है ॥१५॥ हे सूतपुत्र ! आप सत्य कहिये कि, उनका उपाय है या नही है ॥सूतजी बोले करोड जन्मके पुण्यसंचय होने से शिवमें भक्ति उत्पन्न होती है ॥१६॥ उस भक्ति के होनेसे इष्टपूर्तादि कर्मोकी कामना छोड़कर मनुष्य शिवजीमे अर्पण बुद्धिसे यथाविधि कर्म करता है ॥१७॥ उन शिवजीकी कृपा से जब यह प्राणी दृढ भक्तिमान होता है, तब विघ्न छोड़कर भयभीत हो देवता चले जाते है ॥१८॥