शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउस भक्तिके करनेसे शिवजीके चरित्र श्रवण करनेकी अभिलाषा उत्पन्न होती है, सुननेसे ज्ञान और ज्ञानसे मुक्ति हो जाती है ॥१९॥ बहुत कहनेसे क्या है, जिसकी शिवजी में दृढ भक्ति है वह करोड़ो पापोसे ग्रसा हो तो भी मुक्त हो जाता है ॥२०॥ अनादरसे, मूर्खतासे, परिहाससे, कपटतासे भी जो मनुष्य शिवभक्तिमें तत्पर है वह अन्त्यज (चांडाल) भी मुक्त हो जाता है ॥२१॥ इस प्रकारसे भक्ति सदा सबके करने योग्य है, इस भक्ति के होतेभी जो मनुष्य संसार से न छूटै ॥२२॥ उस संसारबंधनसे न छूटनेवाले की समान दूसरा कोई भी मूर्ख नही और कुछ शिवजी भक्तिसे ही प्रसन्न नही होते जो नियमसे केवल भक्ति या द्रोहही करते है ॥२३॥ उनपरभी प्रसन्न हो शिव मनवांछित फलप्रदान करते है बडे मोलकी वस्तु कुछ लेकर वा अल्प मोलकी वस्तु अथवा केवल जलही लेकर ॥२४॥ जो नियमसे शिवार्पण करते है, शिवजी प्रसन्न हो उसे त्रैलोक्य देते है, और जो यह न हो सके तो नियम से नमस्कार वा प्रदक्षिणाः ॥२५॥ जो नित्यप्रति शिवजी की करता है, उसके ऊपर भी शिवजी प्रसन्न होते है, और जो प्रदक्षिणा में असमर्थ हो केवल मन में ही शिवजी का ध्यान करे ॥२६॥ चलते बैठते में जो उनका स्मरण करे उसकी भी अभीष्ट पदार्थ प्रदान करते है, चन्दन बेलकाष्ठ तथा वनमें उत्पन्न हुए ॥२७॥ फल जिसके अधिक प्रीति करनेवाले है उस शिवजी की सेवा करनेमें त्रिलोकी में कौन वस्तु दुर्लभ है ? ॥२८॥ वनके उत्पन्न हुए फल मूलादिमें शिवजीकी जैसी प्रीति है वैसी ग्राम नगरके उत्पन्न हुए उत्तम उत्तम फल मूलोंमें नही ॥२९॥ जो ऐसे देवताको छोड़कर अन्य देवताका भजन सेवन करता है, वह मानो गंगा का त्याग करके मृगतृष्णाकी इच्छा करता है ३०॥ परन्तु जिनको करोड़ो जन्मों के पाप चिपट रहे है, उनका चित्त अज्ञान अंधकार से आच्छादित हो रहा है, उनको शिवजी की भक्ति प्रकाशित नही होती ॥३१॥ काल देश स्थल का कुछ नियम नही है जहाँ इसका चित्त रमें वही ध्यान करे ॥३२॥ शिवरूपसे अपने आत्मामें ध्यान करनेसे शिवकी ही मुक्ति को प्राप्त हो जाती है, जिसकी आयु बहुत थोड़ी लक्ष्मी से भी हीन हो और शिवजीकी एक अंशरूपि सार्वभौमपदयुक्त ॥३३॥ 'मैं राजा हूं' ऐसे अभिमान से कहनेवाले को वंशसहित संहार करते है । जो सम्पूर्ण लोकका कर्ता तथा अक्षय ऐश्वर्यवान पुरुषभी ॥३४॥ अभिमारहित हो जो 'शिवः शिवोहं' इस प्रकार से कथन करता है उसको शिव आत्मस्वरूपके तादात्म्यभोगी अर्थात् शिवरूपही कर देते है ॥३५॥ हे ऋषियो! जिस व्रतके करने से प्राणीके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह चारों पदार्थों हस्तगत होते है मै वह पाशुपत व्रत तुमसे वर्णन करता हूँ ॥३६॥ विरजानामक दीक्षाको करके विभूति और रुद्राक्षको धारण कर वेदसारनामक शिवसहस्त्रनामको जप करते हुए ॥३७॥ इस मानव शरीरको त्यागकर शैवशरीर को प्राप्त होने पर लोकको कल्याण करनेहारे शंकर प्रसन्न होकर ॥३८॥ तुमको दर्शन देकर कैवल्य मुक्ति देंगे जब रामचन्द्र दण्डकारण्यमें वास करते थे, तब अगस्त्यजीने उन्हे वह उपदेश दिया था ॥३९॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे शिवभक्त्युत्कर्षनिरूपणं नाम प्रथमोऽध्यायैः ॥१॥ वह मैं सब तुमासे कहता हूँ, तुम भक्तियुक्त हो श्रवण करो ॥४०॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे अगस्त्यराघवसंवादोपक्रमे भाषाटीकायां