शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर जिस प्रकार भ्रम निवृत होने से रजत सीपमें लय हो जाती है इसी प्रकार यह जगत् ज्ञानसे मुझमें लय हो जाता है, मै निर्मल पूर्ण सच्चिदानंदस्वरूप हूँ ॥२॥ मै संगरहित शुद्ध सनातन ब्रह्म हूँ, मै अनादिसिद्धि मायासे युक्त होकर जगतका अकारण होता हूँ ॥३॥ मेरी माया का वर्णन नही हो सकता, उसमे सत्त्व, रज, तम यह तीन गुण रहते है ॥४॥ सत्त्वगुण शुक्लवर्ण मनुष्योंको सुख और ज्ञानक देनेवाला है और रजोगुण का रक्तवर्ण है, यह चंचल और मनुष्यों को दुःख देनेवाला है ॥५॥ तम का कृष्ण वर्ण है, यह जड और सुख दुःखसे उदासीन रहता है, इसी कारण मेरे संयोग से वह त्रिगुणात्मिका माया ॥६॥ मेरे ही अधिष्ठानसे इस प्रकार जगत को रचना करके दिखाती है, जिस प्रकार अज्ञान शुक्ति में रजत और रस्सीमें सर्प दिखाइ देता है ॥७॥ मुझसे मायाके द्वारा आकाशादिकी उत्पत्ति होती है, मुझसे प्रथम आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल, जलसे पृथिवी उत्पन्न होती है, उन्ही पांचोसे उत्पन्न हुआ यह सब देह पंचभूतात्मक कहाता है ॥८॥ पितामाताके भक्षण किये अन्नसे यह षट्कोशात्मक शरीर उत्पन्न होता है, जिसमें स्नायु अस्थि और मज्जा पिता के कोशसे उत्पन्न होते है ॥९॥ त्वचा मांस और रुधिर यह माताके वीर्यसे उत्पन्न होते है इसी प्रकार मात और पिता सम्बन्धी षट्कोशात्मक देह में माता से उत्पन्न होने वाले, पिता से उत्पन्न होनेवाले, रजसे उत्पन्न होनेवाले तथा आत्मासे उत्पन्न होनेवाले, चार पदार्थ है ॥१०॥ उसमें रक्त, मेदा, मज्जा, प्लीहा, यकृत, गुदा, हृदय, नाभि इत्यादि मृदु पदार्थ मातासे उत्पन्न होते है ॥११॥ श्मश्रु, लोम, केश, स्नायु, शिरा, धमनी, नाड़ी, नख, दंत, वीर्य आदि स्थिर पदार्थ पिता के संबधसे होते है ॥१२॥ पुष्टता, वर्ण, तृप्ति, बल, अवयवोंकी दृढ़ता, अलोलुपता, उत्साह इत्यादि रजसे उत्पन्न होते है ॥१३॥ इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, धर्म, अधर्म, भावना, प्रयत्न, ज्ञान, आयुष्य, इन्द्रिय इत्यादि यह आत्मज अर्थात आत्मासे उत्पन्न हुए कहाते है ॥१४॥ श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, और घ्राण यह पांच ज्ञानेन्द्रिय कहाते है ॥१५॥ क्रमसे ही शब्द, स्पर्श, रूप रस गन्ध, यह पांच इनके विषय है, वाणी, हाथ, पैर गुदा और उपस्थ यह पांच कर्मेन्द्रिय है ॥१६॥ बोलना, लेना, देना, चलना, मलविसर्जन और रति यह क्रमसे पांचो इन्द्रियोंके पांच कार्य और मन उभयात्मक है, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त यह अन्तःकरणके चार भेद है ॥१७॥१८॥ सुख और दुःख यह मनका विषय है, स्मृति भय विकल्प इत्यादि मनके कर्म है और जो निश्चय करती है उसीको बुद्धि कँहते है और अहं, मम यह जो अहंकारात्मक मनकी वृत्ति है इसे ही चित्त कहते है ॥१९॥ यह अन्तःकरणभी सतोगुणादिके भेदसे तीन प्रकार का है, सत, रज, तम यह तीन गुण है, जब सतोगुण प्रधान होता है तब ॥२०॥ आस्तिक्य बुधि, स्वच्छता, धर्ममें रुचि इत्यादि सात्विक धर्म प्राप्त होते है और जब रजोगुण होता है तो काम क्रोध मद इत्यादि होते है ॥२१॥ तमोगुणकी प्रधानतामें निद्रा, आलस्य, प्रमाद, वंचना होती है, इन्द्रियों की प्रसन्नता, आरोग्य, आलस्य का न होना, यह गुण सत्त्वसे उत्पन्न होते है ॥२२॥ इन पांच महाभूतोंकी मात्रासे उत्पन्न हुआ यह देह उनके गुणों को धारण करता है, उनमें शब्द, श्रोत्र, इन्द्रिय, वाणी, कुशलतो, लघुता, धैर्य ॥२३॥ और यह बल सात गुण आकाशसे इस स्थूल देहमें प्राप्त होते है, स्पर्शगुण, त्वगिन्द्रिय, उत्क्षेपण (ऊपर को फेंकना) अवक्षेपण (नीचे को फेंकना) आकुंचक (संकोड़ना) प्रसारण (फैलना) गर्मन (चलना) यह पांच कर्म है ॥२४॥ प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान यह पांच प्राण है ॥२५॥ नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय यह पांच उपप्राण कहाते है, यह एकही वायुके विकारको प्राप्त होने पर दश