शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनाम धर लिये है ॥२६॥ उसमें प्राणपवन मुख्य है जो नाभि से लेकर कंठतक स्थित रहता है, और नासिका नाभि तथा हृदयकमलमें गमन करता है ॥२७॥ शब्द के उच्चारण निशब्द निश्वास और श्वासादिकका यही कारण है ॥२८॥ गुद, लिंग, कटि, जंघा, उदर, नाभि, कंठ, अंडकोश, जोड़ोकी संधि और जंघाओंमें अपानवायु रहता है, उसका कर्म मूत्र और पुरीषका विसर्जन (त्याग) करना है ॥२९॥ नेत्र, कर्ण, पाव के घुटने, जिह्वा तथा नासिका इन पांच स्थानों में व्यानवायु रहता है, प्राणायाम रेचक, पूरक, कुंभक इसके कर्म है ॥३०॥ समानवायु सब शरीरमें व्याप्त होकर जठराग्निके सहित बहत्तर हजार नाड़ियोंके रन्ध्रमें संचार करता है ॥३१॥ भोजन किये और पिये हुए सम्पूर्ण रसों के देहकी पुष्टिके निमित्त लेकर चरण, हाथ और अंगकी संधियोंमे उदान वायू रहता है ॥३२॥ देहका उठाना, चलाना यह इसका कर्म कहा है, त्वचा, मांस रक्त अस्थि और स्नायु इन पांच धातुओंके आश्रय नागादि पांच उपप्राण रहते है ॥३३॥ डकार, हुचकी, यह नाग पवन का कर्म, पलक खोलना, लगाना, कटाक्ष, यह कुर्मका कर्म, भूख प्यास, छींकना, कृकलका³ कर्म, आलस्य निद्रा जंभाई देवदत्तका कर्म और शोक और हास्य धनंजय³ का कर्म है ॥३४॥ अग्निके धर्म चक्षु, कृष्ण, नील, शुक्ल इत्यादि रूप भोजनका पाक, स्वतःप्रकाश, क्रोध, तीक्ष्णपन, कृशता, ओज, इन्द्रियोंका तेज, संताप, शूरता ॥३५॥ और बुद्धि यह गुण तेजसे प्राप्त होते है, और रसनेन्द्रिय, रस शीत, चिकटापन, द्रवत्व पसीना और सम्पूर्ण अवयवोंमें कोमलता यह धर्म जल से उत्पन्न होते है ॥३६॥ घ्राणैन्द्रिय, गन्ध, स्थिरता, धैर्य, गुरुत्व यह धर्म पृथ्वीसे उत्पन्न होते है, त्वचा, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा और शुक्र यह सात धातु शरीरको धारण करते हैं ॥३७॥ पुरुषोंका भक्षण किया अन्न जठराग्निसे तीन भाग हो जाता है, तिसका स्थूल भाग मल, मध्यभाग मांस और सूक्ष्म भाग मन होता है, इससे मन अन्नमय कहाता है ॥३८॥ जलका स्थूलभाग मूत्र, मध्यभाग रक्त और कनिष्ठ भाग प्राण कहाता है इससे जलमय प्राण है ॥३९॥ तेजका स्थूलभाग अस्थि, मज्जा मध्यभाग और वाणी सूक्ष्मभाग है, आशय यह है कि अन्न, उदक और तेजरूप सर्व जगत है ॥४०॥ रक्तसे मांस उत्पन्न होता है, मांससे मेदा, मेदसे अस्थि और अस्थिसे मज्जा उत्पन्न होती है ॥४१॥ मांससेही नाडी उत्पन्न होती है, और मज्जासे वीर्य उत्पन्न होता है ॥४२॥ वात, पित्त, कफ यह तीन धातु शरीर में रहते है, शरीरमें दश अंजलि प्रमाण जल रहता है और नौ अञ्जलि रस अर्थात (अन्न) रहता है ॥४३॥ रक्त आठ अञ्जलि, विष्ठा सात अञ्जलि; कफ छः अञ्जलि, पित्त पांच अंजलि और मूत्र चार अञ्जलि रहता है ॥ ४४॥ वसा (चर्बी) तीन अंजलि, मेदा दो अञ्जलि, मज्जा एक अञ्जलि और वीर्य आधी अञ्जलि रहता है, इसी को बल कहते है ॥४५॥ शरीरमें अस्थि तीन सौ साठ, शंख, कपाल, रुचक, आस्तरण और नवक यह पांच प्रकार की अस्थि होती है ॥४६॥ शरीरमें दौ सौ दश २१० अस्थियोंकी सन्धि है, उनको रौरव प्रसर स्कन्दसेचन उलूखल ॥४७॥ समुद्ग मण्डक शंकावर्त और वायसतुण्डक यह आठ भेद अस्थियोंकी संधिके है ॥४८॥ साढ़े तीन करोड़ सब शरीरपर रोम है, और दाढ़ीके बाल तीन लाख है, हे दशरथकुमार ! इस प्रकार यह देहका रूप तुम्हरे प्रति वर्णन किया, इस देहकी समान निस्सार पदार्थ दूसरा त्रिलोकीमें कोई नही है ॥४९॥ इस देहको प्राप्त होकर पापबुद्धि पुरुष महाअभिमान करते है और अहंकाररूप पापसे मुख्यआनन्द मोक्षका कुछभी उपाय