भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

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नही करते, यह महाशोककी बात है ॥५०॥ इस कारण मुमुक्षुको वैराग्य दृढ होनेकी निमित्त यह स्वरूप जानना अवश्य है ॥५१॥ इति श्री पद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे देहस्वरूपनिर्णयो नाम नवमोध्यायः ॥९॥



अध्याय १० श्रीरामचन्द्र बोले- हे भगवन् ! इस देहमें यह जीव कहां वर्तमान है यह कहांसे उत्पन्न होता है और इसका क्या स्वरूप है सो आप कहिये ॥१॥ देहान्तमें यह कहां जाता है और जाकर कहां स्थित होता है और फिर देहमें किस प्रकार आता है वा नही आता सो आप कहिये ॥२॥ श्रीभगवानु उवाच । श्रीभगवान बोले- हे महाभाग! बहुत अच्छी बात पूछी है जो गुप्तसे भी गुप्त है, जिसे इन्द्रादि देवता और ऋषिभी कठिनतासे नही जान सकते ॥३॥ हे रघुनन्दन! मै भी यह किसी दूसरेसे नही कहना चाहता परन्तु तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न होकर मै कहता हूँ ॥४॥ मै ही सत्यस्वरूप ज्ञानस्वरूप अनन्त परमानन्द परमात्मा परज्योति मायासे मोहित जीवोंको न दीखनेहारा, संसारका कारण नित्य विशुद्ध, सम्पूर्णका आत्मा, सर्वान्तर्यामी, निःसंग, क्रियारहित, सब धर्मोंसे परे मनसे भी परे हूँ ॥५॥६॥ मुझे कोई इन्द्रिय नही ग्रहण कर सकती, मै संपूर्णका ग्रहन करनेहारा हूँ, मै सम्पूर्ण लोकका ज्ञाता हूँ और मुझे कोई नही जानता ॥७॥ मै संपूर्ण विकारोंसे रहित हूँ, बाल्य यौवनादि परिणाम आदि विकारभी मुझमें नही है, जहां मनके सहित जाकर वाणी निवृत्ते होजाती है ॥८॥ उस आनन्दब्रह्म मुझको प्राप्त होकर यह प्राणी फिर कहींसे भी भयको प्राप्त नही होता है ॥९॥ जो सम्पूर्ण प्राणियोंको मुझमें देखता है और मुझे संपूर्ण प्राणियोंमें देखता है, वह निन्दारहित हो जाता है ॥१०॥ जिसको संपूर्ण (भूत) प्राणी आत्मारूप दीखते है उस सर्वत्र एकरूप देखनेवालेको शोक और मोह नही होता ॥११॥ यह संपूर्ण भूतोमें गुप्तरूप आत्मा प्रकाशित नही होता, परन्तु संपूर्णमें वर्तमान है, सूक्ष्मदशी श्रवण मनन, निदिध्यासन साधना करनेवाले पुरुषोंको अग्रबुद्धिसे दीखता है, दूसरे मनुष्योंको नही देखता है ॥१२॥ अनादि मायासे युक्त निर्विकार अविनाशी एक मै ही नामरूप रहित ब्रह्म जगत्का कर्ता परमेश्वर हूँ ॥१३॥ जिस प्रकार अविद्याके साक्षीभूत ज्ञानपर स्वप्नमें त्रिलोकी की कल्पना की जाती है इसी प्रकार मुझमें यह सब जगत् उत्पन्न हो दीखता. स्थिति पाता और लय हो जाता है ॥१४॥ अनेक प्रकारकी अविद्याके आश्रय होकर जीवरूपसे भी मै ही निवास करता हूँ, पांच कर्मेन्द्रिय और पांच ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त यह चारो ॥१५॥ पंचप्राण यह सब मिलकर लिंगशरीरको उत्पन्न करते है, उसी लिंगशरीर में अविद्यायुक्त यह चैतन्य का प्रतिबिम्ब पडता है, उसीको व्यवहारमें जीव क्षेत्रज्ञ और पुरुष कहते है ॥१६॥१७॥ वही जीव अनादि कालसे पुण्य पापसे निर्मित हुए स्थावर जंगमादि देहोंमे वास कर शुभाशुभ कर्मका फल भोक्ता है उसीको परलोकगति होती, तथा वही जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति इन अवस्थाओंका भोक्ता है ॥१८॥ जैसे दर्पणके मलिन होनेमें मुखभी मलीन देखता है, इसी प्रकार अन्तःकरणके दोषोंसे आत्मा विकारी दीखता है ॥१९॥ अंतःकरण और जीव इन दोनोंके परस्पर अध्यासके कारण और एकभावका अभिमान करनेसे परमात्माभी दुःखीसा प्रतीत होता है, वास्तव में सब दुःखका धर्म अन्तःकरणमें है जीवमें नही परन्तु जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्बं जलमे पडनेसे वह जलके चलायमान होनेसे चलायमान विदित होता है इसी प्रकार अन्तःकरणके सुख दुःख होनेसे वही जीवमें