शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
by भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished44 pages
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लोहमणी आदिके दृष्टान्त सदुक्तिसे जैसे कि, चुम्बककी शक्तिसे लोहा भ्रमण करता है, इसी प्रकार ब्रह्मकी सत्तासे जगत् भ्रमण करता है श्रवणकौँ पुष्ट करके मनन करें अर्थात् उसका चिन्तन करे वाक्यार्थके विचारका ही नाम मनन कहा है ॥२३॥ ममता और अहंकार रहित सबमें समान संगवर्जित शांति आदि साधन सम्पन्न होकर निरन्तर ध्यानयोगसे आत्माका आत्मासेही ध्यान करनेको निदिध्यासन कहते है ॥२४॥ सम्पूर्ण कर्मके क्षय हो जानेसे जो आत्मा का साक्षात्कार है, किसी को शीघ्र और किसीको चिरकालमें होता है जिसे प्रतिबेधक नही होता उसे शीघ्र और जिसे प्रतिबंधक होते है उसे देरमें होता है ॥२५॥ जो कुछ जीवके किये हुए और करोडों जन्मसंग्रह किये कर्म है वह ज्ञानसे ही नष्ट होते है, कर्म चाहे दशसहस्त्र करोडँनसे नष्ट नही होते ॥२६॥ ज्ञान होने पर जो कुछ पुण्य वा पाप थोडा या बहुत किया जाता है, उससे यह प्राणी लिप्त नही होता ॥२७॥ और जो इस प्राणीके शरीर निर्माणका हेतु प्रारब्धका कर्म है, वह भोगनेसे ही नष्ट होगा, ज्ञानसे नही ॥२८॥ जिसको मो अहंकार नही है, जो सम्पूर्ण संगसे रहित है, सम्पूर्ण प्राणियोंको आत्मामें और सम्पूर्ण प्राणियों में जो आत्माको देखता है इस प्रकार ज्ञानयुक्त विचरता हुआ प्राणी जीवन्मुक्त कहाता है, कारण कि वेह प्रारब्ध कर्मक्षयके निमित्त विचरता है ॥२९॥ सांपकी केंचली सर्पसहित जिस प्रकार देखनेवालोको भय देती है और सर्पके शरीरसे छुटने पर कुछ भी भय नही देती, इसी प्रकार मायामुक्त आत्माके होनेसे अनेक प्रकारसे संसार भय प्रतीत होते है, वहीं जीवन्मुक्त होने से फिर कही किसी प्रकारसे भयभीत नही होता ॥३०॥ जिस समय इस प्राणीके हृदयकी वासना संपूर्ण नष्ट हो जाती है और वैराग्य प्राप्त होता है, तभीयह प्राणी अमृत हो जाता है, यही वेदान्तशास्त्रकी मुख्य शिक्षा है ॥३१॥ जिस प्रकार कैलास वैकंठ आदि दिव्यलोक है, इस प्रकार मोक्ष कोई लोक नही है, मुक्त किसी ग्रामान्तरका निवासी नही होता, केवल हृदयँकी अज्ञानग्रन्थिके नष्ट हो जानेसे मुक्त होता है ॥३२॥ जिसका वृक्ष अग्रभागसे चरण आगे पडता है वह उसी समय नीचे गिरता है, इसी प्रकार ज्ञानी पुरुषोंको ज्ञान होते ही मुक्तिकी प्राप्ति हो जाती है, इस संसारसे वह तत्काल छूट जाता है ॥३३॥ जीवन्मुक्त पुरुष तीर्थमें वा चाण्डालके घरमे देह त्यागन करे अथवा ब्रह्मका चिन्तन करता हुआ देहका त्यागने करे किंवा अचेतनँ होकर मृतक हो जाय, वह ज्ञानके बलसे मुक्तही हो जाता है ॥३४॥ जीवन्मुक्त किसी प्रकारके वस्त्र धारण करे, वा नग्न, भक्ष्य अथवा अभक्ष्य कुछभी खाय चाहे जहां शयन करे वह प्रारब्धँकर्मके क्षय हो जानेसे मुक्त हो जाता है ॥३५॥ जिस प्रकार दुधमें से निकाला हुआ घृत यदि फिर दूधमें डालो वह घृत उसमें नही मिलता उसी प्रकार ज्ञानवान संसारसे विरक्त होकर फिर जगतमें आसक्तँ होता नही ॥३६॥ हे रामचन्द्र! जो इस अध्यायको नित्य पढते और सुनते है वह अनायास देहबंधनसे छूट जाते है ॥३७॥ हे राम! तुम्हारा अन्तःकरण जो संशयके वश हो रहा है इस कारण तुम नित्य इस अध्याय का पाठ करो इससे अनायास तुम्हारी मुक्ति हो जायेगी ॥३८॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु० शिवराघवसंवादे त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥
अध्याय १४ श्रीराम उवाच । शिवजीसे ब्रह्मसाक्षात्कारकी विधि सुनकर अब दूसरे साधनोंसे प्रश्न करते हुए, रामचन्द्रजी बोले- हे भगवन् ! यद्यपि तुम्हारा रूप सच्चिदानंदात्मक निरर्वयव क्रियाशून्ये और निर्दोष है ॥१॥ तथा सब धर्मोसे परे मन और वाणीके अगोचर तुमको सर्वव्यापक होनेसे जीव सर्वस्थानमें स्थित आत्मा स्वरूपसे देखता