शिव पुराण
Shiva Purana
by महर्षि वेदव्यास
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* संक्षिप्त शिवपुराण *
पुष्पोपचारसमर्पणपूर्वक उनका क्रमशः पूजन करे। (यथा इन्द्राय नमः पुष्पं समर्पयामि इत्यादि।) इसी तरह गर्भावरणका भी अपने आवरण-सम्बन्धी मन्त्रसे यजन करे। योग, ध्यान, होम, जप, बाह्य अथवा आभ्यन्तरमें भी देवताका पूजन करना चाहिये। इसी तरह उनके लिये छः प्रकारकी हवि भी देनी चाहिये—किसी एक शुद्ध अन्नका बना हुआ, मूँगमिश्रित अन्न या मूँगकी खिचड़ी, खीर, दधिमिश्रित अन्न, गुड़़का बना हुआ पकवान तथा मधुसे तर किया हुआ भोज्य पदार्थ। इनमेंसे एक या अनेक हविष्यको नाना प्रकारके व्यंजनोंसे संयुक्त तथा गुड़ और खाँड़से सम्पन्न करके नैवेद्यके रूपमें अर्पित करना चाहिये। साथ ही मक्खन और उत्तम दही परोसना चाहिये। पूआ आदि अनेक प्रकारके भक्ष्य पदार्थ और स्वादिष्ट फल देने चाहिये। लाल चन्दन और पुष्पवासित अत्यन्त शीतल जल अर्पित करना चाहिये। मुख-शुद्धिके लिये मधुर इलायचीके रससे युक्त सुपारीके टुकड़े, खैर आदिसे युक्त सुनहरे रंगके पीले पानके पत्तोंके बने हुए बीड़े, शिलाजीतका चूर्ण, सफेद चूना, जो अधिक रूखा या दूषित न हो, कपूर, कंकौल, नूतन एवं सुन्दर जायफल आदि अर्पित करने चाहिये। आलेपनके लिये चन्दनका मूलकाष्ठ अथवा उसका चूरा, कस्तूरी, कुंकुम, मृगमदात्मक रस होने चाहिये। फूल वे ही चढ़ाने चाहिये, जो सुगन्धित, पवित्र और सुन्दर हों। गन्धरहित, उत्कट गन्धवाले, दूषित, बासी तथा स्वयं ही टूटकर गिरे हुए फूल शिवके पूजनमें नहीं देने चाहिये। कोमल वस्त्र ही चढ़ाने चाहिये। भूषणोंमें विशेषतः वे ही अर्पित करने चाहिये, जो सोनेके बने हुए तथा विद्युन्मण्डलके समान चमकीले हों, ये सब वस्तुएँ कपूर, गुग्गुल, अगुरु और चन्दनसे भूषित तथा पुष्पसमूहोंसे सुवासित होनी चाहिये। चन्दन, अगुरु, कपूर, सुगन्धित काष्ठ तथा गुग्गुलके चूर्ण, घी और मधुसे बना हुआ धूप उत्तम माना गया है।
कपिला गायके अत्यन्त सुगन्धित घीसे प्रतिदिन जलाये गये कर्पूरयुक्त दीप श्रेष्ठ माने गये हैं। पंचगव्य, मीठा और कपिला गायका दूध, दही एवं घी—ये सब भगवान् शंकरके स्नान और पानके लिये अभीष्ट हैं। हाथीके दाँतके बने हुए भद्रासन, जो सुवर्ण एवं रत्नोंसे जटित हैं, शिवके लिये श्रेष्ठ बताये गये हैं। उन आसनोंपर विचित्र बिछावन, कोमल गद्दे और तकिये होने चाहिये। इनके सिवा और भी बहुत-सी छोटी-बड़ी सुन्दर एवं सुखद शय्याएँ होनी चाहिये। समुद्रगामिनी नदी एवं नदसे लाया तथा कपड़ेसे छानकर रखा हुआ शीतल जल भगवान् शंकरके स्नान और पानके लिये श्रेष्ठ कहा गया है। चन्द्रमाके समान उज्ज्वल छत्र, जो मोतियोंकी लड़ियोंसे सुशोभित, नवरत्नजटित, दिव्य एवं सुवर्णमय दण्डसे मनोहर हो, भगवान् शिवकी सेवामें अर्पित करनेयोग्य हैं। सुवर्णभूषित दो श्वेत चँवर, जो रत्नमय दण्डोंसे शोभायमान तथा दो राजहंसोंके समान आकारवाले हों, शिवकी सेवामें देनेयोग्य हैं। सुन्दर एवं स्निग्ध दर्पण, जो दिव्य गन्धसे अनुलिप्त, सब ओरसे रत्नोंद्वारा आच्छादित तथा सुन्दर हारोंसे विभूषित हो, भगवान् शंकरको अर्पित करना चाहिये। उनके पूजनमें हंस, कुन्द एवं चन्द्रमाके समान उज्ज्वल तथा गम्भीर ध्वनि