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शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

Page 793 of 850

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Page 793

* वायवीयसंहिता * ७७९

करनेवाले शंखका उपयोग करना चाहिये, जिसके मुख और पृष्ठ आदि भागोंमें रत्न एवं सुवर्ण जड़े गये हों। शंखके सिवा नाना प्रकारकी ध्वनि करनेवाले सुन्दर काहल (वाद्यविशेष), जो सुवर्णनिर्मित तथा मोतियोंसे अलंकृत हों, बजाने चाहिये। इनके अतिरिक्त भेरी, मृदंग, मुरज, तिमिच्छ और पटह आदि बाजे भी, जो समुद्रकी गर्जनाके समान ध्वनि करनेवाले हों, यत्न-पूर्वक जुटाकर रखने चाहिये। पूजाके सभी पात्र और भाण्ड भी सुवर्णके ही बनवाये। परमात्मा महेश्वर शिवका मन्दिर राजमहलके समान बनवाना चाहिये, जो शिल्पशास्त्रमें बताये हुए लक्षणोंसे युक्त हो। वह ऊँची चहारदीवारीसे घिरा हो। उसका गोपुर इतना ऊँचा हो कि पर्वताकार दिखायी दे। वह अनेक प्रकारके रत्नोंसे आच्छादित हो। उसके दरवाजेके फाटक सोनेके बने हुए हों। उस मन्दिरके मण्डपमें तपाये हुए सोने तथा रत्नोंके सैकड़ों खम्भे लगे हों। चाँदवेमें मोतियोंकी लड़ियाँ लगी हुई हों। दरवाजेके फाटकमें मूँगे जड़े गये हों। मन्दिरका शिखर सोनेके बने हुए दिव्य कलशाकार मुकुटोंसे अलंकृत एवं अस्त्रराज त्रिशूलसे चिह्नित हो।

न्यायोपार्जित द्रव्योंसे भक्तिपूर्वक महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये। यदि कोई अन्यायोपार्जित द्रव्यसे भी भक्तिपूर्वक शिवजीकी पूजा करता है तो उसे भी कोई पाप नहीं लगता; क्योंकि भगवान् भावके वशीभूत हैं। न्यायोपार्जित धनसे भी यदि कोई बिना भक्तिके पूजन करता है तो उसे उसका फल नहीं मिलता; क्योंकि पूजाकी सफलतामें भक्ति ही कारण है। भक्तिसे अपने वैभवके अनुसार भगवान् शिवके उद्देश्यसे जो कुछ किया जाय वह थोड़ा हो या बहुत, करनेवाला धनी हो या दरिद्र, दोनोंका समान फल है। जिसके पास बहुत थोड़ा धन है, वह मानव भी भक्तिभावसे प्रेरित होकर भगवान् शिवका पूजन कर सकता है, किंतु महान् वैभवशाली भी यदि भक्तिहीन है तो उसे शिवका पूजन नहीं करना चाहिये। शिवके प्रति भक्तिहीन पुरुष यदि अपना सर्वस्व भी दे डाले तो उससे वह शिवाराधनाके फलका भागी नहीं होता; क्योंकि आराधनामें भक्ति ही कारण है।* शिवके प्रति भक्तिको छोड़कर कोई अत्यन्त उग्र तपस्याओं और सम्पूर्ण महा-यज्ञोंसे भी दिव्य शिवधाममें नहीं जा सकता। अतः श्रीकृष्ण! सर्वत्र परमेश्वर शिवके आराधनमें भक्तिका ही महत्त्व है। यह गुह्यसे भी गुह्यतर बात है। इसमें संदेह नहीं है।

पापके महासागरको पार करनेके लिये भगवान् शिवकी भक्ति नौकाके समान है। इसलिये जो भक्तिभावसे युक्त है, उसे रजोगुण और तमोगुणसे क्या हानि हो


* भक्त्या प्रचोदितः कुर्यादल्पवित्तोऽपि मानवः। महाविभवसारोऽपि न कुर्याद् भक्तिवर्जितः॥
सर्वस्वमपि यो दद्याच्छिवे भक्तिविवर्जितः। न तेन फलभाक् स स्याद् भक्तिरेवात्र कारणम्॥
(शि० पु० वा० सं० उ० खं० २५। ५१-५२)