शिव पुराण
Shiva Purana
by महर्षि वेदव्यास
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सकती है? श्रीकृष्ण! अन्त्यज, अधम, मूर्ख अथवा पतित मनुष्य भी यदि भगवान् शिवकी शरणमें चला जाय तो वह समस्त देवताओं एवं असुरोंके लिये भी पूजनीय हो जाता है। अतः सर्वथा प्रयत्न करके भक्तिभावसे ही शिवकी पूजा करे; क्योंकि अभक्तोंको कहीं भी फल नहीं मिलता। (अध्याय २५)
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पञ्चाक्षर-मन्त्रके जप तथा भगवान् शिवके भजन-पूजनकी महिमा, अग्निकार्यके लिये कुण्ड और वेदी आदिके संस्कार, शिवाग्निकी स्थापना और उसके संस्कार, होम, पूर्णाहुति, भस्मके संग्रह एवं रक्षणकी विधि तथा हवनान्तमें किये जानेवाले कृत्यका वर्णन
उपमन्यु कहते हैं—यदुनन्दन! कोई बड़ा भारी पाप करके भी भक्तिभावसे पञ्चाक्षर-मन्त्रद्वारा यदि देवेश्वर शिवका पूजन करे तो वह उस पापसे मुक्त हो जाता है। जो भक्तिभावसे पञ्चाक्षर-मन्त्रद्वारा एक ही बार शिवका पूजन कर लेता है, वह भी शिवमन्त्रके गौरववश शिवधामको चला जाता है। जो मूढ़ दुर्लभ मानव-जन्म पाकर भगवान् शिवकी अर्चना नहीं करता, उसका वह जन्म निष्फल है; क्योंकि वह मोक्षका साधक नहीं होता। जो दुर्लभ मानव-जन्म पाकर पिनाकपाणि महादेवजीकी आराधना करते हैं, उन्हींका जन्म सफल है और वे ही कृतार्थ एवं श्रेष्ठ मनुष्य हैं। जो भगवान् शिवकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं, जिनका चित्त भगवान् शिवके सामने प्रणत होता है तथा जो सदा ही भगवान् शिवके चिन्तनमें लगे रहते हैं, वे कभी दुःखके भागी नहीं होते।* मनोहर भवन, हाव, भाव, विलाससे विभूषित तरुणी स्त्रियाँ और जिससे पूर्ण तृप्ति हो जाय, इतना धन—ये सब भगवान् शिवकी आराधनाके फल हैं। जो देवलोकमें महान् भोग और राज्य चाहते हैं, वे सदा भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हैं। सौभाग्य, कान्तिमान् रूप, बल, त्याग, दयाभाव, शूरता और विश्वमें विख्याति—ये सब बातें भगवान् शिवकी पूजा करनेवाले लोगोंको ही सुलभ होती हैं। इसलिये जो अपना कल्याण चाहता हो, उसे सब कुछ छोड़कर केवल भगवान् शिवमें मन लगा उनकी आराधना करनी चाहिये। जीवन बड़ी तेजीसे जा रहा है, जवानी शीघ्रतासे बीती जा रही है और रोग तीव्रगतिसे निकट आ रहा है, इसलिये सबको पिनाकपाणि महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये, जबतक मृत्यु नहीं आती है,
* दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं येऽर्चयन्ति पिनाकिनम्॥
तेषां हि सफलं जन्म कृतार्थास्ते नरोत्तमाः। भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतचेतसः॥
भवसंस्मरणोद्युक्ता न ते दुःखस्य भागिनः॥
(शि० पु० वा० सं० उ० खं० २६। १५–१७)