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शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

Page 795 of 850

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Page 795

* वायवीयसंहिता * ७८१

जबतक वृद्धावस्थाका आक्रमण नहीं होता और जबतक इन्द्रियोंकी शक्ति क्षीण नहीं हो जाती है, तबतक ही भगवान् शंकरकी आराधना कर लो। भगवान् शिवकी आराधनाके समान दूसरा कोई धर्म तीनों लोकोंमें नहीं है।*

अब मैं अग्निकार्यका वर्णन करूँगा। कुण्डमें, स्थण्डिलपर, वेदीमें, लोहेके हवनपात्रमें या नूतन सुन्दर मिट्टीके पात्रमें विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करके उसका संस्कार करे। तत्पश्चात् वहाँ महादेवजीकी आराधना करके होमकर्म आरम्भ करे। कुण्ड दो या एक हाथ लंबा-चौड़ा होना चाहिये। वेदीको गोल या चौकोर बनाना चाहिये। साथ ही मण्डल भी बनाना आवश्यक है। कुण्ड विस्तृत और गहरा होना चाहिये। उसके मध्यभागमें अष्टदल-कमल अंकित करे। वह दो या चार अंगुल ऊँचा हो। कुण्डके भीतर दो बित्तेकी ऊँचाईपर नाभिकी स्थिति बतायी गयी है। मध्यमा अंगुलिके मध्यम और उत्तम पर्वोंके बराबर मध्यभाग या कटिभाग जानना चाहिये। साधु पुरुष चौबीस अंगुलके बराबर एक हाथका परिमाण बताते हैं। कुण्डकी तीन, दो या एक मेखला होनी चाहिये। इन मेखलाओंका इस तरह निर्माण करे, जिससे कुण्डकी शोभा बढ़े। सुन्दर और चिकनी योनि बनाये, जिसकी आकृति पीपलके पत्तेकी भाँति अथवा हाथीके अधरोष्ठके समान हो; कुण्डके दक्षिण या पश्चिम भागमें मेखलाके बीचोबीच सुन्दर योनिका निर्माण करना चाहिये, जो मेखलासे कुछ नीची हो। उसका अग्रभाग कुण्डकी ओर हो तथा वह मेखलाको कुछ छोड़कर बनायी गयी हो। वेदीके लिये ऊँचाईका कोई नियम नहीं है। वह मिट्टी या बालूकी होनी चाहिये। गायके गोबर या जलसे मण्डल बनाना चाहिये। पात्रका परिमाण नहीं बताया गया है। कुण्ड और मिट्टीकी वेदीको गोबर और जलसे लीपना चाहिये। पात्रको धोकर तपाये तथा अन्य वस्तुओंका जलसे प्रोक्षण करे। अपने-अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार कुण्डमें और वेदीपर उल्लेखन (रेखा) करे। (रेखाओंपरसे मृत्तिका लेकर ईशानकोणमें फेंक दे।) फिर अग्निके उस आसनका कुशों अथवा पुष्पोंद्वारा जलसे प्रोक्षण करे। तत्पश्चात् पूजन और हवनके लिये सब प्रकारके द्रव्योंका संग्रह करे। धोनेयोग्य वस्तुओंको धोकर प्रोक्षणीके जलसे उनका प्रोक्षण करके उन्हें शुद्ध करे। इसके बाद सूर्यकान्तमणिसे प्रकट, काष्ठसे उत्पन्न, श्रोत्रियकी अग्निशालामें संचित अथवा दूसरी किसी उत्तम अग्निको आधार-सहित ले आये। उसे कुण्ड अथवा वेदीके ऊपर तीन बार प्रदक्षिणक्रमसे घुमाकर अग्निबीज (रं)-का उच्चारण करके उस अग्निको उक्त कुण्ड या वेदीके आसनपर


* त्वरितं जीवितं याति त्वरितं याति यौवनम्॥
त्वरितं व्याधिरभ्येति तस्मात्पूज्यः पिनाकधृक्। यावन्नायाति मरणं यावन्नाक्रमते जरा॥
यावन्नेन्द्रियवैकल्यं तावत्पूजय शंकरम्। न शिवार्चनतुल्योऽस्ति धर्मोऽन्यो भुवनत्रये॥
(शि० पु० वा० सं० उ० खं० २६। २१—२३)