Skip to content
BharatKosha
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

Page 796 of 850

Read in context
Page 796

७८२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

स्थापित कर दे। कुण्डमें स्थापित करना हो तो योनिमार्गसे अग्निका आधान करे और वेदीपर अपने सामनेकी ओर अग्निकी स्थापना करे। योनिप्रदेशके पास स्थित विद्वान् पुरुष समस्त कुण्डको अग्निसे संयुक्त करे। साथ ही यह भावना करे कि अपनी नाभिके भीतर जो अग्निदेव विराजमान हैं, वे ही नाभिरन्ध्रसे चिनगारीके रूपमें निकलकर बाह्य अग्निमें मण्डलाकार होकर लीन हुए हैं। अग्निपर समिधा रखनेसे लेकर घीके संस्कारपर्यन्त सारा कार्य मन्त्रज्ञ पुरुष अपने गृह्यसूत्रमें बताये हुए क्रमसे मूलमन्त्रद्वारा सम्पन्न करे। तदनन्तर शिवमूर्तिकी पूजा करके दक्षिण पार्श्वमें मन्त्र-न्यास करे और घृतमें धेनुमुद्राका प्रदर्शन करे। स्रुक् और स्रुवा—ये दोनों धातुके बने हुए हों तो ग्रहण करनेयोग्य हैं। परंतु काँसी, लोहे और शीशेके बने हुए स्रुक्, स्रुवाको नहीं ग्रहण करना चाहिये अथवा यज्ञसम्बन्धी काष्ठके बने हुए स्रुक्, स्रुवा ग्राह्य हैं। स्मृति या शिवशास्त्रमें जो विहित हों, वे भी ग्राह्य हैं अथवा ब्रह्मवृक्ष (पलास या गूलर) आदिके छिद्ररहित बिचले दो पत्ते लेकर उन्हें कुशसे पोंछे और अग्निमें तपाकर फिर उनका प्रोक्षण करे। उन्हीं पत्तोंको स्रुक् और स्रुवाका रूप दे उनमें घी उठाये और अपने गृह्यसूत्रमें बताये हुए क्रमसे शिवबीज (ॐ)-सहित आठ बीजाक्षरोंद्वारा अग्निमें आहुति दे। इससे अग्निका संस्कार सम्पन्न होता है। वे बीज इस प्रकार हैं—श्रुं स्तुं बुं श्रूं पुं डुं हूं। ये सात हैं, इनमें शिवबीज (ॐ)-को सम्मिलित कर लेनेपर आठ बीजाक्षर होते हैं। उपर्युक्त सात बीज क्रमशः अग्निकी सात जिह्वाओंके हैं। उनकी मध्यमा जिह्वाका नाम बहुरूपा है। उसकी तीन शिखाएँ हैं। उनमेंसे एक शिखा दक्षिणमें और दूसरी वाम दिशा (उत्तर)-में प्रज्वलित होती है और बीचवाली शिखा बीचमें ही प्रकाशित होती है। ईशानकोणमें जो जिह्वा है, उसका नाम हिरण्या है। पूर्वदिशामें विद्यमान जिह्वा कनका नामसे प्रसिद्ध है। अग्निकोणमें रक्ता, नैर्ऋत्यकोणमें कृष्णा और वायव्यकोणमें सुप्रभा नामकी जिह्वा प्रकाशित होती है। इनके अतिरिक्त पश्चिममें जो जिह्वा प्रज्वलित होती है, उसका नाम मरुत् है। इन सबकी प्रभा अपने-अपने नामके अनुरूप है। अपने-अपने बीजके अनन्तर क्रमशः इनका नाम लेना चाहिये और नामके अन्तमें स्वाहाका प्रयोग करना चाहिये। इस तरह जो जिह्वामन्त्र* बनते हैं, उनके द्वारा क्रमशः प्रत्येक जिह्वाके लिये एक-एक घीकी आहुति दे, परंतु मध्यमाकी तीन जिह्वाओंके लिये तीन आहुतियाँ दे। कुण्डके मध्यभागमें 'रं वह्नये स्वाहा' बोलकर तीन आहुतियाँ दे। ये आहुतियाँ घी अथवा समिधासे देनी चाहिये। आहुति देनेके पश्चात् अग्निमें जलका सेचन करे। ऐसा करनेपर वह अग्नि भगवान् शिवकी हो जाती है। फिर उसमें शिवके आसनका चिन्तन करे और वहाँ अर्धनारीश्वर भगवान् शिवका


* ओं श्रुं त्रिशिखायै बहुरूपायै स्वाहा (दक्षिणे मध्ये उत्तरे च) ३। ओं स्तुं हिरण्यायै स्वाहा (ऐशान्यै) १। ओं बुं कनकायै स्वाहा (पूर्वस्याम्) १। ओं श्रूं रक्तायै स्वाहा (आग्नेय्याम्) १। ओं पुं कृष्णायै स्वाहा (नैर्ऋत्याम्) १। ओं डुं सुप्रभायै स्वाहा (पश्चिमायाम्) १। ओं हूं मरुज्जिह्वायै स्वाहा (वायव्ये) १।

शिव पुराण · Page 796 of 850 · BharatKosha