शिव पुराण
Shiva Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context* वायवीयसंहिता * ७९७
शिवस्य च शिवायाश्च वर्मणा शिवभाविते।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम्॥ ४४॥
शिव और शिवाकी कवचरूपा मूर्तियाँ शिवभावसे भावित हो शिव-पार्वतीकी आज्ञाका सत्कार करके मेरी कामना सफल करें॥ ४४॥
शिवस्य च शिवायाश्च नेत्रमूर्ती शिवाश्रिते।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम्॥ ४५॥
शिव और शिवाकी नेत्ररूपा मूर्तियाँ शिवके आश्रित रह उन्हीं दोनोंकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे मेरा मनोरथ प्रदान करें॥ ४५॥
अस्त्रमूर्ती च शिवयोर्नित्यमर्चनतत्परे।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम्॥ ४६॥
शिव और शिवाकी अस्त्ररूपा मूर्तियाँ नित्य उन्हीं दोनोंके अर्चनमें तत्पर रह उनकी आज्ञाका सत्कार करती हुई मुझे मेरी अभीष्ट वस्तु प्रदान करें ॥ ४६॥
वामो ज्येष्ठस्तथा रुद्रः कालो विकरणस्तथा।
बलो विकरणश्चैव बलप्रमथनः परः॥ ४७॥
सर्वभूतस्य दमनस्तादृशाश्चाष्टशक्तयः।
प्रार्थितं मे प्रयच्छन्तु शिवयोरेव शासनात्॥ ४८॥
वाम, ज्येष्ठ, रुद्र, काल, विकरण, बलविकरण, बलप्रमथन तथा सर्वभूत-दमन—ये आठ शिवमूर्तियाँ तथा इनकी वैसी ही आठ शक्तियाँ—वामा, ज्येष्ठा, रुद्राणी, काली, विकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथनी तथा सर्वभूतदमनी—ये सब शिव और शिवाके ही शासनसे मुझे प्रार्थित वस्तु प्रदान करें॥ ४७-४८॥
अथानन्तश्च सूक्ष्मश्च शिवश्चाप्येकनेत्रकः।
एकरुद्रस्त्रिमूर्तिश्च श्रीकण्ठश्च शिखण्डिकः॥ ४९॥
तथाष्टौ शक्तयस्तेषां द्वितीयावरणेऽर्चिताः।
ते मे कामं प्रयच्छन्तु शिवयोरेव शासनात्॥ ५०॥
अनन्त, सूक्ष्म, शिव (अथवा शिवोत्तम), एकनेत्र, एकरुद्र, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ और शिखण्डी—ये आठ विद्येश्वर तथा इनकी वैसी ही आठ शक्तियाँ—अनन्ता, सूक्ष्मा, शिवा (अथवा शिवोत्तमा), एकनेत्रा, एकरुद्रा, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठी और शिखण्डिनी, जिनकी द्वितीय आवरणमें पूजा हुई है, शिवा और शिवके ही शासनसे मेरी मनःकामना पूर्ण करें॥ ४९-५०॥
भवाद्या मूर्तयश्चाष्टौ तासामपि च शक्तयः।
महादेवादयश्चान्ये तथैकादशमूर्तयः॥ ५१॥
शक्तिभिः सहिताः सर्वे तृतीयावरणे स्थिताः।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां दिशन्तु फलमीप्सितम्॥ ५२॥
भव आदि आठ मूर्तियाँ और उनकी शक्तियाँ तथा शक्तियोंसहित महादेव आदि ग्यारह मूर्तियाँ, जिनकी स्थिति तीसरे आवरणमें है, शिव और पार्वतीकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे अभीष्ट फल प्रदान करें॥ ५१-५२॥
वृषराजो महातेजा महामेघसमस्वनः।
मेरुमन्दरकैलासहिमाद्रिशिखरोपमः ॥ ५३॥
सिताभ्रशिखराकारककुदा परिशोभितः।
महाभोगीन्द्रकल्पेन वालेन च विराजितः॥ ५४॥
रक्तास्यशृङ्गचरणो रक्तप्रायविलोचनः।
पीवरोन्नतसर्वाङ्गः सुचारुगमनोज्ज्वलः॥ ५५॥
प्रशस्तलक्षणः श्रीमान् प्रज्वलन्मणिभूषणः।
शिवप्रियः शिवासक्तः शिवयोर्ध्वजवाहनः॥ ५६॥
तथा तच्चरणन्यासपावितापरविग्रहः।
गोराजपुरुषः श्रीमाञ् श्रीमच्छूलवरायुधः।
तयोराज्ञां पुरस्कृत्य स मे कामं प्रयच्छतु॥ ५७॥
जो वृषभोंके राजा महातेजस्वी, महान् मेघके समान शब्द करनेवाले, मेरु, मन्दराचल, कैलास और हिमालयके