शिव पुराण
Shiva Purana
by महर्षि वेदव्यास
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शिखरकी भाँति ऊँचे एवं उज्ज्वलवर्णवाले हैं, श्वेत बादलोंके शिखरकी भाँति ऊँचे ककुदसे शोभित हैं, महानागराज (शेष) के शरीरकी भाँति पूँछ जिनकी शोभा बढ़ाती है, जिनके मुख, सींग और पैर भी लाल हैं, नेत्र भी प्रायः लाल ही हैं, जिनके सारे अंग मोटे और उन्नत हैं, जो अपनी मनोहर चालसे बड़ी शोभा पाते हैं, जिनमें उत्तम लक्षण विद्यमान हैं, जो चमचमाते हुए मणिमय आभूषणोंसे विभूषित हो अत्यन्त दीप्तिमान् दिखायी देते हैं, जो भगवान् शिवको प्रिय हैं और शिवमें ही अनुरक्त रहते हैं, शिव और शिवा दोनोंके ही जो ध्वज और वाहन हैं तथा उनके चरणोंके स्पर्शसे जिनका पृष्ठभाग परम पवित्र हो गया है, जो गौओंके राजपुरुष हैं, वे श्रेष्ठ और चमकीला त्रिशूल धारण करनेवाले नन्दिकेश्वर वृषभ शिव और शिवाकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे अभीष्ट वस्तु प्रदान करें॥ ५३—५७॥
नन्दीश्वरो महातेजा नगेन्द्रतनयात्मजः।
सनारायणकैर्देवैर्नित्यमभ्यर्च्य वन्दितः॥ ५८॥
शर्वस्यान्तःपुरद्वारि सार्धं परिजनैः स्थितः।
सर्वेश्वरसमप्रख्यः सर्वासुरविमर्दनः॥ ५९॥
सर्वेषां शिवधर्माणामध्यक्षत्वेऽभिषेचितः।
शिवप्रियः शिवासक्तः श्रीमच्छूलवरायुधः॥ ६०॥
शिवाश्रितेषु संसक्तस्त्वनुरक्तश्च तैरपि।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे कामं प्रयच्छतु॥ ६१॥
जो गिरिराजनन्दिनी पार्वतीके लिये पुत्रके तुल्य प्रिय हैं, श्रीविष्णु आदि देवताओंद्वारा नित्य पूजित एवं वन्दित हैं, भगवान् शंकरके अन्तःपुरके द्वारपर परिजनोंके साथ खड़े रहते हैं, सर्वेश्वर शिवके समान ही तेजस्वी हैं तथा समस्त असुरोंको कुचल देनेकी शक्ति रखते हैं, शिवधर्मका पालन करनेवाले सम्पूर्ण शिवभक्तोंके अध्यक्षपदपर जिनका अभिषेक हुआ है, जो भगवान् शिवके प्रिय, शिवमें ही अनुरक्त तथा तेजस्वी त्रिशूल नामक श्रेष्ठ आयुध धारण करनेवाले हैं, भगवान् शिवके शरणागत भक्तोंपर जिनका स्नेह है तथा शिवभक्तोंका भी जिनमें अनुराग है, वे महातेजस्वी नन्दीश्वर शिव और पार्वतीकी आज्ञाको शिरोधार्य करके मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें॥ ५८—६१॥
महाकालो महाबाहुर्महादेव इवापरः।
महादेवाश्रितानां तु नित्यमेवाभिरक्षतु॥ ६२॥
दूसरे महादेवके समान महातेजस्वी महाबाहु महाकाल महादेवजीके शरणागत भक्तोंकी नित्य ही रक्षा करें॥ ६२॥
शिवप्रियः शिवासक्तः शिवयोरर्चकः सदा।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम्॥ ६३॥
वे भगवान् शिवके प्रिय हैं, भगवान् शिवमें उनकी आसक्ति है तथा वे सदा ही शिव तथा पार्वतीके पूजक हैं, इसलिये शिवा और शिवकी आज्ञाका आदर करके मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें॥ ६३॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः शास्ता विष्णोः परा तनुः।
महामोहात्मतनयो मधुमांसासवप्रियः।
तयोराज्ञां पुरस्कृत्य स मे कामं प्रयच्छतु॥ ६४॥
जो सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्त्विक अर्थके ज्ञाता, भगवान् विष्णुके द्वितीय स्वरूप, सबके शासक तथा महामोहात्मा कद्रूके पुत्र हैं, मधु, फलका गूदा और आसव जिन्हें प्रिय हैं, वे नागराज भगवान् शेष शिव और पार्वतीकी आज्ञाको सामने रखते हुए मेरी इच्छाको पूर्ण करें॥ ६४॥
ब्रह्माणी चैव माहेशी कौमारी वैष्णवी तथा।
वाराही चैव माहेन्द्री चामुण्डा चण्डविक्रमा॥ ६५॥