शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 232 of 526
Read in context१४६ शुक्रनीतिः
मतवाला नहीं होना चाहिये। और नालायक सन्तान पर 'यह मेरा पुत्र है' ऐसी ममता नहीं करनी चाहिये ।
साध्वी भार्या पितृपत्नी माता बालः पिता स्नुषा । अभर्तृकाऽनपत्या या साध्वी कन्या स्वसापि च ॥ १२२ ॥ मातुलानी भ्रातृभार्या पितृमातृस्वसा तथा । मातामहोऽनपत्यश्च गुरुश्वशुरमातुलाः ॥ १२३ ॥ बालोऽपिता च दौहित्रो भ्राता च भगिनीसुतः । एतेऽवश्यं पालनीयाः प्रयत्नेन स्वशक्तितः ॥ १२४ ॥ अविभवेऽपि विभवे पितृमातृकुलं सुहृत् । पत्न्याः कुलं दासदासीभृत्यवर्गांश्च पोषयेत् ॥ १२५ ॥ बिकलाङ्गान् प्रव्रजितान् दीनानाथांश्च पालयेत् ।
**साध्वी भार्यादिका यत्नपूर्वक पालने का निर्देश—**सुशीला स्त्री, विमाता, माता, अविवाहिता कन्या, पिता, पुत्रवधू, बिना पति और पुत्र की कन्या या बहन, मामी, भाई की वधू, पिता की बहन (फूआ), मां की बहन (मौसी), निःसन्तान नाना, गुरु, श्वशुर या मामा, बिना पिता का पुत्र, लड़की का लड़का (नाती), भाई या भानजा इन सबों का धन न रहने पर भी यथाशक्ति यत्नपूर्वक अवश्य पालन करना चाहिये। और यदि धन हो तो पिता तथा माता के कुलवाले एवं मित्र, पत्नी के कुल (ससुराल) वाले, दास, दासी और भृत्य वर्गों का पालन-पोषण करना चाहिये और विकलाङ्ग (काने, लंगड़े आदि), संन्यासी, दीन और अनाथ लोगों का पालन करना चाहिये ।
कुटुम्बभरणार्थेषु यत्नवान्न भवेच्च यः ॥ १२६ ॥ तस्य सर्वगुणैः किन्तु जीवन्नेव मृतश्च सः ।
**जीवन्मृत पुरुषों का निर्देश—**जो कुटुम्ब-पालन के विषय में प्रयत्नशील नहीं होता है वह सर्वगुण-संपन्न होते हुये भी जीवित रहकर मरे हुये के समान है अर्थात् उसका जीवन व्यर्थ है।
न कुटुम्बं भृतं येन नाशिताः शत्रवोपि न ॥ १२७ ॥ प्राप्तं संरक्षितं नैव तस्य किं जीवितेन वै ।
जिसने कुटुम्ब का भरण-पोषण नहीं किया और शत्रुओं को नष्ट नहीं किया एवं प्राप्त वस्तु की भलीभांति रक्षा नहीं की, उसके जीने से क्या अर्थात् उसका जीवन वृथा है।
स्त्रीनिर्जितो ऋणी नित्यं सुदरिद्रश्च याचकः ॥ १२८ ॥ गुणहीनोऽर्थहीनः सन् मृता एते सजीवकाः