शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextतृतीयोऽध्यायः [१४७]
जो स्त्रियों के वशीभूत रहनेवाला, नित्य ऋण लेनेवाला, अत्यन्त दरिद्र, मांगनेवाला, गुण से हीन और धन से रहित है, ऐसे लोग जीवित रहकर मरे हुये के तुल्य हैं।
आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमैथुनभेषजम् ॥ १२९॥ दानमानापमानं च नवैतानि सुगोपयेत् ।
**गुप्त रखने योग्य बातों का निर्देश—**आयु, धन, गृह के दोष, मन्त्र, मैथुन, औषध, दान, मान, अपमान इन ९ विषयों को अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये (किसी से नहीं कहना चाहिये)।
देशाटनं राजसभावेशनं शास्त्रचिन्तनम् ॥ १३०॥ वेश्यादिदर्शनं विद्वन्मैत्रीं कुर्यादतन्द्रितः ।
**देशाटनादि की कर्त्तव्यता—**आलस्यरहित होकर देशभ्रमण, राजसभा में प्रवेश, शास्त्रों का चिन्तन, वेश्या आदि का दर्शन, विद्वानों के साथ मैत्री करनी चाहिये।
अनेकाश्च तथा धर्माः पदार्थाः पशवो नराः ॥ १३१॥ देशाटनात् स्वानुभूताः प्रभवन्ति च पर्व्वताः ।
**देशाटन के लाभ—**इनमें से देशाटन करने से मनुष्यों को अनेक प्रकार के धर्म, पदार्थ, पशु, मनुष्य और पर्व्वतों का अनुभव साक्षात् प्राप्त होता है।
कीदृशा राजपुरुषा न्यायान्यायं च कीदृशम् ॥ १३२॥ मिथ्याविवादिनः के च के वै सत्यविवादिनः । कीदृशी व्यवहारस्य प्रवृत्तिः शास्त्रलोकतः ॥ १३३॥ सभागमनशीलस्य तद्विज्ञानं प्रजायते ।
**सभा में बैठने से लाभ का वर्णन—**सभा में प्रवेश करने से मनुष्यों को राजपुरुष किस प्रकार के होते हैं ? न्याय-अन्याय कैसा होता है ? झूठा विवाद और सच्चा विवाद उपस्थित करनेवाले कैसे होते हैं ? शास्त्र और लोक के अनुसार ऋण देने आदि रूप विवाद-विषय का कैसा निर्णय होता है ? इत्यादि विषयों का विशिष्ट ज्ञान होता है।
नाहङ्कारो च धर्मान्धः शास्त्राणां तत्त्वचिन्तनैः ॥ १३४॥ एकं शास्त्रमधीयानो न विन्द्यात् कार्य्यनिर्णयम् । स्याद्बह्वागमसंदर्शी व्यवहारो महानतः ॥ १३५॥ बुद्धिमानभ्यसेन्नित्यं बहुशास्त्राण्यतन्द्रितः ।
**बहुत से शास्त्रों के अध्ययन के फल—**बहुत से शास्त्रों के तत्त्वों का चिन्तन करने से अहङ्कार तथा धर्मान्धता से युक्त नहीं होना चाहिये। और एक शास्त्र का केवल अध्ययन करके किसी कार्य (तत्त्व) का निर्णय नहीं करना