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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

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तृतीयोऽध्यायः १५१

के साथ वार्तालाप, उपकार, सुन्दर आशय-प्रदर्शन, इन सबों के करने से जगत् को अपने वशीभूत करना चाहिये।

एते वश्यकरोपाया दुर्जने निष्फलाः स्मृताः ।
तत्सन्निधिं त्यजेत्प्राज्ञः शक्तस्तं दण्डतो जयेत् ॥ १५४ ॥
छद्मभूतैस्तु तद्रूपैरुपायैरेभिरेव वा ।

**वश करने के उपायों की दुर्जनों के विषय में विफलता का निर्देश—**किन्तु उपर्युक्त ये सभी वश करने के उपाय दुर्जनों के विषय में प्रयोग करने पर निष्फल सिद्ध होते हैं, अतः बुद्धिमानों को उनकी ( दुर्जनों की ) संगति छोड़ देनी चाहिये बल्कि यदि सामर्थ्य हो तो उन्हें दण्ड देकर अथवा बनावटी उक्त प्रेमादि रूप इन्हीं उपायों से वशीभूत करना चाहिये ।

श्रुतिस्मृतिपुराणानामभ्यासः सर्वदा हितः ॥ १५५ ॥
साङ्गानां सोपवेदानां सकलानां नरस्य हि ।

**वेदादि के अभ्यास की हितकारिता का निर्देश—**मनुष्यों के लिये संपूर्ण शिक्षा, व्याकरण, कल्प, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष इन ६ अङ्गों के सहित, ऋक्, यजुः, साम, अथर्व इन ४ वेदों एवं धनुर्वेदादि ४ उपवेदों, १८ मन्वादि स्मृतियों तथा १८ पुराणों का सर्वदा अभ्यास करना हितकर है ।

मृगयाक्षाः स्त्रियः पानं व्यसनानि नृणां सदा ॥ १५६ ॥
चत्वार्येतानि सन्त्यज्य युक्त्या संयोजयेत् क्वचित् ।

**मनुष्यों के ४ व्यसनों का निर्देश—**सदा मृगया (शिकार) और अक्ष (जूआ) खेलना, स्त्री-संभोग करना, मद्यादि पीना, ये ४ मनुष्यों के लिये व्यसन कहे हुये हैं, इन्हें सदा करना त्याग कर कभी थोड़ा सा समय आने पर कर लेना उचित होता है अन्यथा नहीं।

कूटेन व्यवहारं तु वृत्तिलोपं न कस्य चित् ॥ १५७ ॥
न कुर्याच्चिन्तयेत्कस्य मनसाप्यहितं क्वचित् ।

**कूट व्यवहार का निषेध—**किसी के साथ कपटपूर्ण व्यवहार या आजीविका की हानि नहीं करनी चाहिये, एवं कभी किसी का अहित भी मन से नहीं सोचना चाहिये (करना तो दूर रहा)।

तत्कार्यं तु सुखं यस्माद्भवेत्त्रैकालिकं दृढम् ॥ १५८ ॥
मृते स्वर्गं जीवति च विन्द्यात्कीर्तिं दृढां शुभाम् ।

**विहित कार्य करने का निर्देश—**जिस कार्य के करने से इह लोक और पर लोक दोनों में स्थिर सुख मिले अर्थात् मरने पर स्वर्ग और जीवित रहने पर स्थिर तथा सुन्दर कीर्ति का लाभ हो उसी (कार्य) को करना चाहिये ।

जागर्ति च सचिन्तो य आधिव्याधिनिपीडितः ॥ १५९ ॥