शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context१५० | शुक्रनीतिः
श्रेष्ठ व्यक्ति के संमुख बिना अनुमति के नहीं बैठना चाहिये। और 'राजा हमारा मित्र है' यह समझ कर मनमाना कार्य नहीं करना चाहिये।
नेच्छेन्मूर्खस्य स्वामित्वं दास्यमिच्छेन्महात्मनाम् ॥ १४८ ॥
विरोधं न ज्ञानलवदुर्विदग्धस्य रञ्जनम् ।
मूर्ख का स्वामी बनने की इच्छा का निषेध— मूर्ख जनका स्वामी बनने की इच्छा न करे किन्तु महान् आत्मा (उच्च विचार) वालों का दास भी बनने की इच्छा करे अथवा मूर्खों का स्वामी या दास कुछ भी बनने की इच्छा न करे और महात्माओं के साथ विरोध करने की इच्छा न करे। एवं थोड़े से ज्ञान से ही अपने को बहुत बड़ा चतुर माननेवाले व्यक्ति को खुश करने की इच्छा न करे अथवा उन्हें विरुद्ध या खुश करने की इच्छा न करे।
अत्यावश्यमनावश्यं क्रमात् कार्यं समाचरेत् ॥ १४९ ॥
प्राक्पश्चाद्वाऽत्विलम्बेन प्राप्तं कार्यं तु बुद्धिमान् ।
आवश्यक कार्य को सर्वप्रथम करने का निर्देश— बुद्धिमान मनुष्यों को बहुत से कार्य हाथ में आ जाने पर उनमें से अत्यावश्यक और अनावश्यक कार्यों को छाटकर क्रम से अत्यावश्यक कार्य को प्रथम एवं शीघ्रता से करना चाहिये और अनावश्यक को पीछे तथा विलम्ब से करना चाहिये।
पित्राज्ञप्तेनापि मातृवधरूपे सुपुजिता ॥ १५० ॥
धृता गोतमपुत्रेण ह्यकार्ये चिरकारिता ।
बुरे कार्य में देरी करने का निर्देश— और न करने योग्य बुरे कार्य के करने में देरी करना अत्यन्त उचित होता है जैसे इन्द्र के साथ व्यभिचार कराने के दोष से कुपित हुये गोतम के द्वारा अपनी स्त्री अहल्या का वध करने की आज्ञा पाने पर भी उनके पुत्र शतानन्द का मातृवध में देरी करना उचित हुआ।
प्रेम्णा समीपवासेन स्तुत्या नत्या च सेवया ॥ १५१ ॥
कौशल्येन कलामिश्च कथाभिर्ज्ञानतोऽपि च ।
आदरेणार्जवेनैव शौर्याद्वानेन विद्यया ॥ १५२ ॥
प्रत्युत्थानाभिगमनैरानन्दस्मितभाषणैः ।
उपकारैः स्वाशयेन वशीकुर्याज्जगत् सदा ॥ १५३ ॥
जगत् को वश में करने के उपाय— सदा प्रेम, समीप में रहना, स्तुति, नमस्कार, सेवा, चतुरता, कलाओं (गाना-बजाना आदि ६४ प्रकार की), कथा कहना, ज्ञानोपदेश, आदर, सरलता, शूरता, दान, विद्या, सामने आने पर अपने आसन से उठना या आगे जाकर लिवालाना, आनन्द तथा मुस्कुराहट