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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

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तृतीयोऽध्यायः १४६

शृङ्गिणां नखिनां चैव दंष्ट्रिणां दुर्जनस्य च । नदीनां बसतौ स्त्रीणां विश्वासं नैव कारयेत् ॥ १४२ ॥ श्रृङ्गी आदि का विश्वास करने का निषेध— सींगवाले पशु-बैल आदि, नख से प्रहार करनेवाले भालू आदि, दाढ़ीवाले व्याघ्रादि, दुर्जन, नदी और स्त्री इनके समीप में रहने पर विश्वास नहीं करना चाहिये ।

खादन्न गच्छेदध्वानं न च हास्येन भाषणम् । शोकं न कुर्यान्नष्टस्य स्वकृतेरपि जल्पनम् ॥ १४३ ॥ गमनादि के निषेध के विषय— भोजन करते हुये रास्ता चलना, हंसते हुये बात करना, नष्ट हुई वस्तु या बीती हुई बात या मरे हुये व्यक्ति के विषय में शोक करना, अपने किये हुये कार्य की स्वयं प्रशंसा रूप में वर्णन इन सबों को नहीं करना चाहिये ।

स्वशङ्कितानां सामीप्यं त्यजेद्वै नीचसेवनम् । सँल्लापं नैव शृणुयाद् गुप्तः कस्यापि सर्वदा ॥ १४४ ॥ अपने ऊपर शंका रखनेवालों तथा दुर्जनों के समीप में रहना एवं नीचों की सेवा त्याग देनी चाहिये । और सर्वदा छिपकर किसी की बातें नहीं सुननी चाहिये ।

उत्तमैरननुज्ञातं कार्यं नेच्छेद्रुच तैः सह । देवैः सार्कं सुधापानाद्राहोश्छिन्नं शिरो यतः ॥ १४५ ॥ बड़ों की आज्ञा के बिना उनके साथ कार्य करने का निषेध— यदि श्रेष्ठ लोगों की अपने साथ कार्य करने की अनुमति न हो तो उनके साथ उस कार्य की करने की इच्छा न करे, क्योंकि देवताओं के साथ बिना अनुमति के अमृत-पान करने से राहु का शिर काटा गया ।

महतोऽसत्कृतमपि भवेत्तद् भूषणाय वै । विषपानं शिवस्यैव त्वन्येषां मृत्युकारकम् ॥ १४६ ॥ तेजस्वी क्षमते सर्वं भोक्तुं बह्निरिवानघः । निन्दित भी कार्यों का बड़ों के लिये भूषण होने का निर्देश— सर्व साधारण के लिये प्रसिद्ध नहीं करने योग्य कार्य भी बड़े लोगों के लिये भूषण होता है । जैसे विषपान शिवजी के लिये ही भूषण हुआ किन्तु अन्यों के लिये वही मृत्यु का कारण होता है, क्योंकि निष्पाप तेजस्वी व्यक्ति अग्नि के समान सब कुछ भोजन करने के लिये समर्थ होता है ।

न साम्मुख्ये गुरोः स्थेयं राज्ञः श्रेष्ठस्य कस्यचित् ॥ १४७ ॥ राजा मित्रमिति ज्ञात्वा न कार्यं मानसेप्सितम् । बिना अनुमति के श्रेष्ठ के संमुख बैठने का निषेध— गुरुजन, राजा या किसी