शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context| १५४ | शुक्रनीतिः |
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झूठ, साहस (बिना विचारे कार्य करना), मूर्खता और काम की अधिकता होती है अतः बिना काम की अधिकता के स्त्री के साथ एक शय्या पर नहीं शयन करना चाहिये ।
दृष्ट्वा धनं कुलं शीलं रूपं विद्यां बलं वयः ॥ १७१ ॥
कन्यां दद्यादुत्तमं चेन्मैत्रीं कुर्याद्यात्मनः ।
वर और मित्र की परीक्षा करने का निर्देश— धन, कुल, शील, रूप, विद्या, बल और अवस्था (उम्र) इन सबों को देखकर जिस वर में ये सब उत्तम रीति से हों उसी को कन्या देनी चाहिये, क्योंकि यदि ये सब उत्तम होते हैं तो कन्या भी उस वर से अपनी मैत्री जोड़ती है अथवा यदि कुलादि उत्तम हो तभी उससे अपनी मैत्री या संबन्ध करना उचित होता है।
भार्यार्थिनं वयोविद्यारूपिणं निर्धनं त्वपि ॥ १७२ ॥
न केवलेन रूपेण वयसा न धनेन च ।
वर के लक्षण— भार्यार्थी (विवाह करने के लिये इच्छुक) यदि अवस्था (विवाह योग्य उम्र), विद्या तथा रूप से युक्त हो किन्तु धन उत्तम न हो तो भी उसे बुलाकर कन्या दे देनी चाहिये किन्तु केवल रूप, अवस्था या धन देखकर कन्या नहीं देनी चाहिये ।
आदौ कुलं परीक्षेत ततो विद्यां ततो वयः ॥ १७३ ॥
शीलं धनं ततो रूपं देशं पश्चाद्विवाहयेत् ।
सर्वप्रथम वर के कुल, उसके बाद विद्या, उसके बाद अवस्था, उसके बाद शील, धन, रूप तथा देश की क्रमशः परीक्षा करने के पश्चात् उसके साथ कन्या का विवाह करना चाहिये ।
कन्या वरयते रूपं माता वित्तं पिता श्रुतम् ॥ १७४ ॥
बान्धवाः कुलमिच्छन्ति मिष्टान्नमितरे जनाः ।
विवाहार्थ कन्या वर के रूप की सुन्दरता, माता उत्तम धन, पिता उत्तम विद्या, बान्धव गण उत्तम कुल पसन्द करते हैं किन्तु इनसे अन्य बराती लोग केवल मिष्ट (मधुर) अन्न खाने की इच्छा रखते हैं क्योंकि उन्हें वरादि के कुलादि से कोई प्रयोजन नहीं है।
भार्यार्थं वरयेत्कन्यामसमानर्षिगोत्रजाम् ॥ १७५ ॥
भ्रातृमतीं सुकुलां च योनिदोषविवर्जिताम् ।
कन्या के लक्षण— भार्या बनाने के लिये अपने से भिन्न ऋषि और गोत्र वाली, भाई से संयुक्त, अच्छे कुल में उत्पन्न हुई, योनि रोग से रहित अथवा निर्दोष मांसे पैदा हुई कन्या का वरण करना वर के लिये उचित है।
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ॥ १७६ ॥