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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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तब राजा ने शकटाल को आदेश दिया कि तुम इसका आदि और अन्त भाग बताओ। उस बुद्धिमान मन्त्री ने छडी को जल मे डाल दिया और अन्तभाग जान लिया क्योकि जो मूल-भाग था वह थोडा सा जल मे डूब गया। उत्तर सुनकर उन सेवकों ने जाकर अपने राजा से बताया।

कथा- 50

"धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि की कथा"

जाङ्गल नामक गाँव में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि दो मित्र थे जो धन की आशा से परदेश गये। वहाँ से प्रचुर धन अर्जन कर जब वे लौटे तो कुछ धन पीपल के पेड़ के नीचे गाडकर शेष धन लेकर अपने-अपने घर चले गये। उस दुष्टबुद्धि ने खोदकर उस धन को लेकर अपने घर ला रखा। कुछ समय बाद दोनों मिले और पीपल के नीचे स्थित द्रव्य को लेने गये। जब देखा तो वहाँ धन नही था। धर्मबुद्धि ने यह सारा वृतान्त मन्त्री से बताया। मन्त्री द्वारा बलपूर्वक पूछे जाने पर उसने (कुबुद्धि) सिर्फ इतना बताया कि मैंने सहस्र पण छोड़ दिया था, इसके लिए शपथ दिलाऊँगा।

धर्मबुद्धि ने भी इस बात को स्वीकार कर लिया तो मन्त्री ने दोनों की जमानत लेकर छोड़ दिया और वे अपने-अपने घर चले गये। तब दुष्टबुद्धि ने यह सारा वृतान्त अपने पिता को बताकर उस वृक्ष के कोटर में बिठा दिया। प्रातः दोनों वादी, मन्त्री और कौतूकाकृष्ट लोग उस पीपल के पास गये। स्नान किये दुष्टबुद्धि ने हाथ जोड़कर सत्य-शपथ कर कहा हे वृक्षोत्तम्! सच-सच कहना-यदि मैंने धन चुराया हो तो हाँ बोलना, यदि नहीं चुराया हो तो नहीं बोलना। ऐसा सुनकर सबके सामने उसके पिता ने कहा-इसने नहीं चुराया। तब धर्मबुद्धि ने उसके पिता का शब्द जानकर कोटर में आग लगा दी। चिल्लाते, अधजले उसके पिता को कोटर से गिरा देखकर मन्त्री ने दुष्टबुद्धि को दण्डित कर धर्मबुद्धि को सुखी किया।

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