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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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कथा- 51

"ब्राह्मण गाङ्ग्लि की सेना की कथा"

चमत्कार पुर नामक नगर में चारों वेद को जानने वाले, चारों वर्ण वाले, चारों आश्रम वाले, लोग रहते थे। एक बार वहाँ के ब्राह्मण बल्लभनाथ का दर्शन करने के लिए गाड़ियों, घोड़ो आदि पर सवार हो, भोजन सामग्री लेकर और अच्छे मूल्यवान वस्त्र पहिनकर पुत्रकलत्र समेत चल दिये गये। रास्ते में चोर लूटमार करने लगे। जिससे वे सभी भयभीत होकर भाग गये लेकिन गाङ्ग्लि नामक लंगड़ा ब्राह्मण उन सभी के साथ भाग नहीं सका। चोरों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। गाङ्ग्लि ने डरे हुए अपने भाई से साहसी मनुष्यों की भाँति कहा भ्रातः! कितने हाथी और घोडे हैं? शीघ्र ही बताओ और धनुष दो जिससे इन्हें दिव्य अस्त्र से एक साथ मारूँ। यह सुनकर सभी चोर भाग गये। अतः जो धर्म-अर्थ-काम के विषय में बोलना जानता है उसे पुरूषो में कौन ऐसा है जो बल से जीत सकता है अर्थात् कोई नहीं।

कथा- 52

"जयश्री की कथा"

शुक ने प्रभावती से कहा कि- भूतल पर प्रतिष्ठान नामक नगर में सत्त्वशील नाम का राजा था। उसके पुत्र का नाम दुर्दमन था। वह पैतृक सम्पत्ति को त्याग कर सम स्वभाव वाले मित्रों ब्राह्मण, बढ़ई तथा वणिक् पुत्र के साथ परदेश को चला गया और चारों ने मिलकर विचार किया कि हमें रत्न भूमि समुद्र की सेवा करनी चाहिए। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर समुद्र ने उन चारों को चिन्तामणि के समान गुण वाले चार रत्न दिये घर लौटते समय विश्वास कर सबने चारों रत्नों को बनिये को सौंप दिया।

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