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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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Page 107

कथा- 54

"विप्र विष्णु के दूतकर्म की कथा"

शुक ने प्रभावती से कहा कि– शक्रावती नामक नगर में धर्मादिगुणों से युक्त धर्मदत्त नामक राजा था। उसका मन्त्री सुशील था। उस मन्त्री का पुत्र विष्णु परराष्ट्र मन्त्री था। जब उस पद से उसे हटा दिया गया तो वह धनहीन होकर भी मैं राज–कुल का अमात्य हूँ ऐसा अहंकार युक्त और कठोर हो गया। मन्त्री ने राजा से कहा कि विष्णु के ऊपर आपकी कोई कृपा नहीं है वह आपका भक्त, अनुरक्त और दूतकर्म में प्रवीण है, तो देव? कहीं भेजकर इसकी परीक्षा लें। तब राजा ने भस्म रूप भेट सामग्री पर अपनी मुहर लगाकर उसे विदिशा नगर में शत्रुदमन नामक राजा के पास भेजा। राजा ने जब उस अमङ्गलकारी भस्म को देखा तो कुपित हो गया। विष्णु ने राजा को क्रोधित देखकर कहा कि– अश्वमेघ यज्ञ कुण्ड का भस्म है जो त्रेता की अग्नि से उत्पन्न पवित्र पापनाशक तथा कल्याणकारक है। ऐसा कहकर सहसा उठकर हाथ पर भस्म रख, राजा को समर्पित कर दिया। राजा ने उसके वचन से प्रसन्न हो भस्म का वन्दन किया। उस तुष्ट राजा ने उसके बदले मूल्यवान उपायन भेजा और विष्णु को सम्मानित कर विदा किया।

कथा- 55

"श्रीधर ब्राह्मण की कथा"

चर्मकूट नामक गाँव में श्रीधर ब्राह्मण था। वहीं पर चन्दन चमार भी रहता था। श्रीधर ने उस चमार से एक जोड़ी जूता बनवाया और पैसे नहीं दिया। वह चमार रोज पैसे मांगता लेकिन श्रीधर यही कहता कि मैं तुम्हें प्रसन्नचित कर दूँगा। बहुत दिन बाद चमार ने ब्राह्मण को पकड़ लिया। उसी समय ग्रामपाल के घर पुत्र हुआ था। तब ब्राह्मण ने छलपूर्वक चमार से कहा मैंने तुम्हें प्रसन्नचित करने को कहा था इस पुत्र के पैदा होने पर तुम प्रसन्न हो या नहीं। चमार यदि नहीं कहता है तो राजा

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