शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextका दण्ड पात्र बने अन्यथा धन जाता है। उसने कहा मैं प्रसन्न हूँ। अतः छलपूर्वक मुक्त होकर ब्राह्मण अपने घर गया।
कथा- 56
"सन्तक्त वणिक् की कथा"
त्रिपथ गाँव में सान्तक नाम बनिया बड़ा धनी किन्तु कृपण दुःस्वभाव था और उसे अपना गाँव नही अन्य-अन्य गाँव प्रिय थे। एक दिन वह अन्य गाँव से वसूली करके आ रहा था तो उसे चारों ओर से चोरों ने घेर लिया। चोरों से घिरा जानकर उसने गलग्रह नामक यक्ष के आगे द्रव्य रखकर हाथ में खरिया मिट्टी लेकर कहा-देव! मैने तुम्हारी सबसे वसूली की, यह धन जो कुछ वृद्धि (व्याज) समेत मुझे मिला है इसे लीजिए।
यह देखकर कि 'यह तो यक्ष का धन है' उसे प्रणाम कर चोर चले गये और वह भी धन लेकर कुशल पूर्वक घर गया।
कथा- 57
"शुभङ्कर की कथा"
अवन्तीपुरी में विक्रमार्क राजा था। उसकी पत्नी का नाम चन्द्रलेखा था। मदनातुरा उसने शुभङ्कर नामक राजपण्डित को चाह लिया और अपने स्थान पर अपनी दासी को अपना परिधान पहनाकर स्वयं दासी का वेष बनाकर कामुक के घर जाकर रतिक्रीडा नित्य इच्छा भर करती। एक दिन राजा ने रानी की चोरी पकड़ ली।
अगले दिन राजा ने प्रातः क्रियाओं को समाप्त कर पण्डित शुभङ्कर और रानी को बुलाया। पण्डित को सिंहासन पर बिठाकर बात-चीत के सिलसिले में राजा ने हँसते हुए कहा- 'कृतकं मन्ये भयं योषिताम्' यह वचन सुनकर उसका हृदय अपने दोष से विस्मत हो गया और पण्डित ने कहा-
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