Skip to content
BharatKosha
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

Page 116 of 208

Read in context
Page 116

वानर ने कहा—मगर! तो तुम मुझे बेकार ले जाते हो क्योंकि मैं हृदयहीन हूँ। मेरा हृदय गूलर अथवा बरगद के पेड़ पर रहता है, उसे लेकर मैं पुनः जल में वापस आता हूँ।

ऐसा कहने पर मूर्ख मगर समुद्र के किनारे वापस आया। वानर भी उसकी पीठ से उछलकर वृक्ष पर चढ़ गया और मगर से बोला— अब पेड़ पर स्थित मुझे तुझ ऐसे लोग नही ग्रहण कर सकते।

कथा- 68

"वचचेवति की कथा"

विद्यास्थान नामक एक ब्राह्मणों का गाँव है। जहाँ पर केशव नामक ब्राह्मण ने स्नान के लिये गये हुए सरोवर पर एक सुन्दर बनिये की पुत्री देखी। वह उसके साथ रति करना चाहता था। वणिक् पुत्री ने ब्राह्मण से सिर पर दूसरा घड़ा रखने को कहा। घड़ा रखते समय उसने उसके ओठ चूम लिए। ऐसा करता हुआ वह उसके पति द्वारा देख लिया गया और राजा के पास लाया गया। उसका वितर्क नामक मित्र था। उसने उसके पास आकर यह कहा—मित्र!—राजा के पास पहुँचकर 'वचचेवति' वाक्य ही कहना और कुछ नहीं। वैसा करने पर मन्त्री ने कहा— यह निर्दोष है। इसकी ऐसी प्रकृति ही है। उसी उत्तर से लेकर लोक में विर्तक की सहायिका बुद्धि से वह सज्जनता को प्राप्त माना गया।

कथा- 69

"वेजिका की कथा"

कलास्थान नामक स्थान है, वहाँ एक बनिया था जिसकी भार्या वेजिका अत्यन्त प्रिय थी। एक दिन जब वह पति को स्नान करा रही थी तो उपपति को मार्ग पर जाता देखकर यहाँ काफी पानी नहीं है— ऐसा बहाना बनाकर पानी लेने घर से निकल पड़ी और उपपति के साथ बहुत समय लगा दिया। तब जार से उपभोग की

[ 107 ]