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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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गयी उसने अपने पति को धोखा देना सोचकर कुएँ में कूद गयी। बहुत शोरगुल मचा। कुएँ मे स्त्री गिर गयी-ऐसा प्रवाद फैल गया। उसके पति ने यह प्रवाद सुनकर अवश्य मेरी पत्नी कुएँ में गिर गयी होगी। वह जल्दी से आया और अपनी पत्नी को कुएँ में से निकाला और सम्मान किया।

कथा- 70

"प्रभावती और मदन की कथा"

इतनी कथाओ के अन्त होते-होते उसका पति मदन विनोद विदेश से आ गया। उसके आ जाने वह उसी प्रकार पूर्ववत् उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करने लगी। और बोली-आर्यपुत्र! आप वन्दनीय है जिनके घर में त्रिविक्रम के लाये हुए दो पक्षियों में से एक शुक सब लोगों का हितभाषी है, विशेषतः मेरा तो बन्धु के समान है, ज्यों-ज्यो वह शुक की प्रशंसा करती त्यों-त्यों शुक लज्जित होता जाता था।

तब मदन उसका वचन सुनकर बोला-शुक ने तुम्हारा क्या उपकार किया है। यह कैसे इस प्रकार गुणशाली हो गया।

उसने कहा-स्वामिन्! तुम्हारे विदेश चले जाने पर कुछ समय तक मैंने तुम्हारा वियोग सहा, बाद में दुष्ट सखियों की सङ्गति में पड़ गयी। अन्य पुरूष से रमण करने की इच्छा वाली मेरे गमन में बाधा डालने वाली सारिका को मैंने मारना चाहा, लेकिन वह उडकर दूर चली गयी। इस शुक ने अपने वाग्रपञ्च से मुझे सत्तर दिनों तक रोक रक्खा, अतः मैने कर्म से तो पाप नही किया केवल मनसा पाप किया।¹ आज से तुम मेरे जीवन-मरण के स्वामी हो-मेरा जीवन मरण आपके हाथ में हैं। ऐसा सुनकर मदनविनोद ने शुक से पूछ तो उसने कहा-


¹ अतो मया कर्मणा पापं नं विहितं मनसा तु कृतम्।
शुकसप्ततिः पेज सं० 276,

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