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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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दुष्टो की सङ्गति से सज्जन भी विकार को प्राप्त हो जाते हैं। दुर्योधन का साथ करने से भीष्म गायो को हरने के लिए गये थे।¹

क्योकि प्राचीन काल मे छल से विद्याधर ने राजा की पुत्री का उपभोग किया था। विद्याधर के द्वारा उपभुक्त उस कन्या को उसके पति ने निर्दोष ही माना और शुक ने मदन के आगे इस कथा को कहा-

भूतल पर मलय पर्वत है। उसके अङ्क पर मनोहर नाम गन्धर्वपुर है। उसमें मदन नामक गन्धर्व रहता था। उसकी रत्नावली नाम की पत्नी थी।

उनकी पुत्री मदनमञ्जरी थी। उसके रूप को देखकर देव अथवा दानव सभी उधोमुख अथवा पतनोन्मुख हो मुग्ध हो जाते थे।

एक दिन नारद जी आये। वे भी इसके रूप को देखकर मूर्च्छित और सकाम हो गये और वाद में होश आने पर शाप दिया कि इसका शील अवश्य भङ्ग होगा। तब राजा ने कहा-स्वामिन्! प्रसन्न होकर अनुग्रह करें।

नारद ने कहा-इसके शील के भङ्ग होने से इसे दोष नही होगा और न इसका पति परित्याग करेगा और कहा कि मेरु पर्वत पर विपुलापरी में रहने वाला कनकप्रभ नाम गन्धर्व है, वही तुम्हारी पुत्री का वर होगा।

तब मुनि के कथनानुसार उसका विवाह गन्धर्व के साथ हुआ। वह एक बार उसे छोड़कर कैलाश को गया। तब किसी विद्याधर ने उसके पति का गन्धर्व रूप धारण कर उसका भोग किया। उसे दुष्ट मानकर उसका पति देवी के सामने उसे मारने लगा तो उसने कहा स्वामी! तुमने मुझे वर दिया था कि तुम्हें गन्धर्व चक्रवर्ती पुत्र होगा तो क्यों बिना पुत्र का मुख देखे मर रही हूँ।


1 असतां सङ्गदोषेण साधवो यान्ति विक्रियाम्।
दुर्योधनप्रसङ्गेन भीष्मो गोहरणे गतः।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 338, पेज सं० 279

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