शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextइस प्रकार विलाप करती मदनमञ्जरी के सामने उसके विषय में देवी ने कनकप्रभ से कहा-हे गन्धर्व वीर इसका कोई दोष नही है, विद्याधर ने माया से तुम्हारा रूप धारण कर इसका उपभोग किया तो रहस्य न जानने वाली इसका दोष नही है और नारदमुनि का ऐसा शाप भी था।
हे वणिक् पुत्र! यदि मेरा वचन सत्य समझते हो तो इस निर्दोष के प्रति अनुग्रह करो। इस प्रकार शुक के कहने से मदन ने उसे अङ्गीकार किया। हरिदत्त ने भी पुत्र के आगमन से बडा भारी उत्सव किया। उस महोत्सव में एक दिव्यमाला आकाश से आ गिरी। उस माला का दर्शन होने पर शुक, सारिका और त्रिविक्रम शाप मुक्त हो स्वर्ग को गये। मदन भी प्रिया प्रभावती के साथ सुख भोगने लगा।
कथाओं का वर्गीकरण एवं उद्देश्य :
उपर्युक्त कहानियों में 69 कथायें शिक्षापरक हैं। 70 वी कथा भी जो कि उपसहार के रुप मे शुक द्वारा कही गयी भी शिक्षा प्रद तो है ही साथ ही निश्चित उद्देश्य को ध्यान मे रखकर कही गयी है। प्रत्येक कहानी का एक लक्ष्य है, एक उद्देश्य है। ये कहानियाँ आकर्षक एवं मनोरञ्जक होने के साथ ही एक उद्देश्य को भी व्यक्ति के समक्ष रखती हैं- वह है कुमार्ग से बचने का।
यदि इन कहानियो का वर्गीकरण किया जाय तो इनमें से लगभग आधे से अधिक अर्थात 40 से 45 कथाये व्यभिचारिणी स्त्रियों की कथायें हैं। इन कहानियों के मुख्य पात्र विवाहिता स्त्रियाँ है जो पति के रहने पर भी उपपति के साथ रति भोग करती है और पकडे जाने पर उसे किसी न किसी बहाने बड़े चालाकी के साथ छिपाने का प्रयत्न करती हैं। यशोदेवी, राजिका, धनश्री, श्रियादेवी आदि इसी श्रेणी की विवाहित स्त्रियाँ है। कुछ कथाये वेश्या स्त्रियों से सम्बन्धित हैं जो व्यभिचार के माध्यम से पुरुषों को धोखा देती हैं। जैसे-कलावती, मदनावेश्या आदि इसी श्रेणी के अंतर्गत आती हैं। कतिपय कथायें कुलटा स्त्रियों से भी सम्बन्धित हैं जो परपुरुषों का
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