शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextव्यभिचार के माध्यम से अपना स्वार्थ सिद्ध करती हैं जैसे- केलिका एवं धूर्तमाया कुट्टिनी की कथा। जो चौर्यरति सम्बन्धी शिक्षा देने के माध्यम से वणिक् पुत्र का सम्पूर्ण धन ग्रहण कर लेती हैं।
इन कहानियों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि 'शुकसप्तति' कालीन (14 वीं शताब्दी के आस-पास) समाज में विवाहित स्त्रियों की दाशा सुदृढ़ नहीं थी। पति के कार्यवश विदेश चले जाने पर पत्नियाँ अपने मनोरञ्जन हेतु व्यभिचार रूप कुमार्ग का अवलम्ब लेती थीं और उस घृणित कार्य का पता लग जाने पर उसे छिपाने के लिए कभी चतुरता पूर्वक, कभी बुद्धि-कौशल द्वारा और कभी व्यवहार-कौशल द्वारा उसे छिपाने का हर संभव उपाय करती थीं किन्तु समाज में एक ऐसा भी प्रबुद्ध वर्ग था जो इन स्त्रियो के विषय में यह चिन्ता करता था एवं प्रयत्न करता था कि वे कुमार्ग पर न जायें। वस्तुतः इसी भावना को लेकर शुकसप्तति की रचना हुई है। कवि शुक के माध्यम से यह अथक प्रयास कर रहा है कि कथा की नायिका प्रभावती मदनविनोद के परदेश चले जाने पर यह प्रयत्न कर रही है कि वह व्यभिचारिणी न बने, जिसके फलस्वरूप 70 कहानियों का जन्म हुआ। यद्यपि ये कहानियाँ कल्पित ही अधिक हैं किन्तु इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता कि कवि इस प्रकार की स्त्रियों के आचरण से प्रभावित है। कुछ कथायें पशुओं से भी सम्बन्धित हैं। जैसे-शशक और पिङ्गलनाम सिंह की कथा, व्याघ्रचारी और सिंह की कथा, व्याघ्रमारी और जम्बुक की कथा, जम्बुक की मुक्ति की कथा, हंसराट् शङ्खधवल की कथा, आदि।
उपर्युक्त पशुओं की कथाओं के माध्यम से कवि सबल पर निर्बल प्राणी के विजय को द्योतित करना चाहता है। शश, वानर आदि निर्बल प्राणी होते हुये भी अपनी बुद्धि पराक्रम द्वारा शक्तिशाली, पराक्रमी सिंह जैसे पशुओं को कैसे परास्त करते हैं तथा अपने प्राणों की रक्षा करते हैं इत्यादि भावना को लक्ष्य में रखकर ये कथाये लिखी गयी हैं।
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