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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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राजा, मन्त्री, महारानियाँ, राजपुरूष इत्यादि राजवर्गीय पात्रो के अंतर्गत आते है जिनका पर्याप्त वर्णन शुकसप्तति मे हुआ है। जैसे- पुष्पहास और रानी, राजा सुदर्शन, राजा शत्रुमर्दन एव पुत्री मदनरेखा आदि की कथायें।

प्रजावर्गीय पात्रो मे साधारण कोटिक स्त्रियाँ, ब्राह्मण, वणिक्, कृषक, चोर, धूर्त, सेवक, (मास विक्रेता) अधिकांश कथाओं के पात्र इसी श्रेणी के हैं।

अनेक कथाओ मे शुकसप्तति में इस प्रकार के पात्रों का वर्णन है।

आर्षवर्गीय पात्रो मे ऋषि, मुनि, सन्यासी इत्यादि पात्र आते है। जिनका वर्णन भी शुकसप्तति मे यत्र-तत्र प्राप्त होता है। ये समस्त पात्र कथानक के मुख्य पात्र (नायक-नायिका) से व्यतिरिक्त सहायक पात्र रूप मे प्रयुक्त होते है।

(ग) नाट्यशास्त्रीय लक्षणों के आधार पर :

कथावस्तु के अन्तर्गत गौण पात्रो से व्यतिरिक्त मुख्यपात्र जिन्हें हम नायक-नायिका कह सकते हैं, का वर्णन होता है। नाट्यशास्त्र के अनुसार नायक मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं-

(1) धीरोद्धत, (2) धीरललित, (3) धीरोदात्त, (4) धीरप्रशान्त¹

नाट्यशास्त्रीय अन्य ग्रन्थों में भी नायक भेद देखे जा सकते है।²

सभी प्रकार के नायकों में धीर शब्द जुडा हुआ है। धीर का वस्तुतः अर्थ है - धैर्ययुक्त अर्थात् महान संकट मे भी कातर न होने वाला।³

दशरूपक के अनुसार नायक चार प्रकार के बतलाये गये हैं-


1 नाट्यशास्त्र- 24.16-17
2 नाट्यदर्पण- चतुर्थ विवेक सा०द० तृतीय परिच्छेद।
3 नाट्य दर्पण- 16

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