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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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(1) धीर ललित :

चिन्तरहित गीत आदि कलाओं का प्रेमी, सुखी और कोमल स्वभाव तथा आचार वाला नायक धीरललित कहलाता है।¹ जिस नरेश का भोग अर्थात् अप्राप्त वस्तु की प्राप्त (अप्राप्तस्य प्राप्तिर्योगः) तथा क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा- प्राप्तस्य परिरक्षण क्षेमः) की सिद्धि अमात्य इत्यादि के द्वारा कर दी जाती है। चिन्तरहित होने के कारण वह गीत आदि कलाओं मे संलग्न रहता है, और भोगों में आसक्त रहता है। श्रृंगार भाव की प्रधानता होने के कारण वह कोमल स्वभाव (सत्व = चित्त) तथा व्यवहार वाला होता है। इसी से इसे "मृदु" कहा गया है। यही ललित नायक है। यथा (कथा नं० 15) मे गुणाकर, (कथा नं० 19) में धनपाल, (कथा नं० 20) मे सूर नामक कृषक आदि भी धीरललित श्रेणी के नायक हैं।

(2) धीर प्रशान्त :

सामान्य गुणों से युक्त द्विज आदि नायक धीर प्रशान्त कहलाता है।² विनय इत्यादि जो नायक के सामान्य गुण³ कहे गये हैं उनसे युक्त द्विज, ब्राह्मण, वणिक्, मंत्री आदि धीरप्रशान्त नायक कहलाते हैं। निश्चिन्तता आदि गुणो से युक्त होने पर भी विप्र इत्यादि में शान्तता ही होती है, लालित्य प्रधान नही होता। यदि किसी विप्र मे धीरललित नायक के गुण विद्यमान हो तो वह भी धीर-प्रशान्त ही माना जायेगा। किन्तु यह नियम सर्वत्र चरितार्थ नहीं होता है, अन्य क्षत्रिय आदि भी धीर प्रशान्त हो सकते हैं जैसे बुद्ध धीर प्रशान्त नायक ही हैं। यथा - केशव (कथा न० 7) धीर प्रशान्त कोटि का पात्र है। ये कथा का प्रधान नायक नहीं है।


1   > निश्चिन्तो धीरललित कलासक्त सुखीमृदुः।

दशरूपक, द्वितीय प्रकाश,3 कारिका

2   > सामान्यगुणयुक्तस्तु धीरशान्तो द्विजादिकः ।

दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, 4 कारिका

3   > नेता विनीतो मधुरस्त्यागी दक्ष प्रियवदः।

रक्तलोकः शुचिर्वाग्मी रूढवंशः स्थिरो युवा।।
बुद्ध्युत्साहस्मृति प्रज्ञाकलामानसमन्वितः ।
शूरो दृढश्च तेजस्वी शास्त्रचक्षुश्च धार्मिकः।।
दशरूपक, द्वितीय प्रकाश,1 कारिका

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