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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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परकीया नायिका दो प्रकार की होती है - कन्या तथा विवाहिता। विवाहिता स्त्री को कभी भी प्रधान रस की नायिका नहीं बनाना चाहिए, जबकि कन्या को कवि मुख्य या अमुख्य रस का आधार बना सकता है।¹

साधारण स्त्री तो गणिका होती है जो कला, प्रगल्भता और धूर्तता से युक्त होती है।² वह छिपकर प्रेम करने वाले, सुखपूर्वक धन प्राप्त करने वाले, अज्ञानी, स्वच्छन्द, अहङ्कारी और पण्डक (नपुंसक) आदि को, यदि धनवान हो तो अनुरक्ता के समान प्रसन्न करती है और धनरहित होने पर इनको (नि.स्वान) माता के द्वारा निकलवा देती है।³ जैसे- कलावती नामक वेश्या (कथा नं० 23), कुटनी (कथा नं० 17) साधरण स्त्री की श्रेणी में आती है। भाव-प्रकाश तथा साहित्य दर्पण में भी सामान्य नायिका का विस्तृत वर्णन किया गया है।⁴

उपर्युक्त वर्णित नायक नायिकाओं के लक्षण एवं स्वरूप का अवलोकन करने के पश्चात् यही कहना उचित प्रतीत होता है कि शुकसप्तति की प्रत्येक कथा में धीरललित या धीरप्रशान्त या धीरोदात्त या धीरोद्धत एवं अनुकूल तथा दक्षिण नायक पाये जाते हैं किन्तु अधिकता दक्षिण नायक की है, ठीक इसी प्रकार शुकसप्तति की प्रत्येक कथा नायिका प्रधान है और प्रत्येक कथा में नायिका का स्वरूप शृङ्गारी है किन्तु कुछ ही कथाये ऐसी है जिनकी नायिकायें मध्या श्रेणी की हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह कहा जाय कि अधिकतर कथाओं की नायिकायें प्रगल्भा श्रेणी की नायिका के अन्तर्गत आती है तो शायद यह गलत नहीं होगा।


1 अन्यस्त्री कन्यकोढा च नान्योढाऽङ्गिरसे क्वचित्।
कन्यानुरागमिच्छात कुर्यादङ्गाङ्गिरसश्रयम्। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश 32 वीं कारिका
2 साधरणस्त्री गणिका कलाप्रागल्भ्यधौर्त्ययुक्। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश 33 वीं कारिका
3 छन्नकामसुखार्थाज्ञस्वतन्त्राह्युपण्डकान्
रक्तेव रञ्जयेदाढ्यान्निःस्वान्मात्र विवासयेत। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश 34 वीं कारिका
4 भाव-प्रकाश (95 4), सा० द० (3.67-71),

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