शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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कलात्मक पक्ष की दृष्टि से शुकसप्तति अपने युग की एक सशक्त रचना है। कथा कौशल की दृष्टि से यह ग्रन्थ अपना निजी वैशिष्ट्य रखता है। कवि ने कथाओ को अधिक प्रभावशाली बनाने हेतु प्रत्येक कथा के प्रारम्भ में तत्कथाविषयक पद्य की रचना की है जिसके कारण श्रोता कौतूहल-वश वक्ता से उस कथा को सुनने का आग्रह करता है और इस प्रकार कथा आरम्भ हो जाती है। कथाओं को और अधिक रोचक और गति प्रदान करने के लिए एवं ग्रन्थकार ने अपनी काव्य प्रवृत्ति को सतुष्टि करने के लिए जहाँ गद्य से काम चल सकता था वहाँ पद्य का प्रयोग किया है। पद्यों का प्रयोग कवि के बौद्धिक ज्ञान का परिचायक है किन्तु यह पद्य अत्यन्त सरल एवं सरस है और कथा गति प्रवाह को अविच्छिन्न गति प्रदान करने में गद्य के समान ही सहायक सिद्ध होते है।
(अ) भाषा :
जैसाकि स्पष्ट है शुकसप्तति में गद्य और पद्य दोनों का प्रयोग हुआ है। इसमें प्रयुक्त गद्य सरलतम शैली मे लिखा गया है जिसके अन्तर्गत वाक्य अत्यन्त छोटे-छोटे होते हैं बोलचाल के रूप में भाषा का सामान्य ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी सरलता और सहजतापूर्वक कथाओ को समझने में समर्थ हो जाता है। सूक्त्यामक गद्य एव नीतिपरक पद्य पाठक या श्रोता को हठात् आकर्षित करते हैं। यत्र-तत्र प्रकृति वर्णन आदि को लेकर अनावश्यक विस्तार भी मिलता है। कहीं-कहीं व्याकरण का भी अशुद्ध प्रयोग प्राप्त होता है। जैसे-पति शब्द का पतिना सप्तम्यन्त पतौ ये व्याकरण सम्मत नही है। इसी प्रकार 'अनुत्पाटयित्वा' के स्थान पर अनुत्पाट्य होना चाहिए क्योंकि संस्कृत में नियम है कि यदि धातु के पहले उपसर्ग आ जाय तो 'क्त्वा' प्रत्यय का प्रयोग नहीं होता बल्कि 'ल्यप' प्रत्यय अवश्य आ जायेगा। इसी प्रकार-'हस्तपादौ' के स्थान पर हस्तपादम् एकवचान्त होना चाहिएज। 'सहामि' पद प्राकृत में