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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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उत्तमपुरुषैकवचनान्त होता है और संस्कृत मे वही आत्मनेपद होने के कारण 'सह्' धातु का 'सहे' रूप होना चाहिए। कहीं-कहीं पर भाषा की प्राकृत क्रिया का भी प्रयोग किया गया है जैसे-अढण्ढोलयत् 'ढोलना' शब्द लङ्लकार का रूप है फिर भी समान रूपेण यह ग्रन्थ भाषा की दृष्टि से सरल, रोचक एवं ग्राह्य है।

(ब) शैली :

इसकी शैली रोचक और आकर्षक है। वक्ता तोता स्त्रियों के दुराचार, पर-पुरुष गमन, त्रिया चरित और वैवाहिक सम्बन्ध विच्छेद आदि के अनेक उदाहरण देकर पर-पुरुष गमन के दोषो का विस्तृत वर्णन करता है। इसमें बीच-बीच में संस्कृत और प्राकृत के उपदेशात्मक पद्य भी है। शुकसप्तति में गद्य और पद्य सर्वत्र वैदर्भी शैली में प्रयुक्त है यही कारण है कि भाषा सहज बोधगम्य है। दीर्घकाय समासों का प्रायः अभाव है। छोटे-छोटे समासों का प्रयोग भाषा की श्रीवृद्धि करने में "सोने में सुहागे" का काम करते हैं। वैदर्भी शैली रस और भावाभिव्यक्ति भावों को अभिव्यक्त करने के लिये सर्वाधिक लोकप्रिय शैली मानी जाती है। इसी शैली का प्रयोग कर कालिदास और अश्वघोष आदि अमर हो गये। शुकसप्तति भी वैदर्भी शैली का एक अनुपम ग्रन्थ है।

(स) रस :

रस-सिद्धान्त भारतीय काव्य मनीषियों एवं कालविदों की महत्तम उपलब्धि है। रस शब्द मात्र से ही भारतीय मनीषा तथा कलाकार की हृत्तन्त्री झटरित होकर आनन्दोल्लास की तरंगें से मुखरित हो उठती है।

रस-शब्द का अर्थ :

भारतीय वाङ्गमय में रस शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में हुआ है। ऐतिहासिक कालक्रमेण रस का अर्थ वैदिककाल से प्रारम्भ हुआ। प्रारम्भ में यह शब्द किसी वस्तु के सार के लिए प्रयुक्त हुआ था और क्रमशः इस शब्द से भाव, सुख और आनन्द का

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