शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in context2- अनुभाव : भावजागर्ति के पश्चात होने वाले अङ्ग-विकारों को अनुभाव कहते हैं। इनकी व्युत्पत्ति के अनुसार (अनु पश्चाद् भावः उत्पत्तिः, येषाम् अथवा अनुपश्चाद् भावो यस्य सोऽनुभावः) स्थायीभावों के जागरित होने के पश्चात् उत्पन्न होने के कारण इन्हे कार्यरूप ही मानना चाहिए।¹ आचार्य विश्वनाथ ने रसोद्बोध की दृष्टि से विभाव, अनुभाव तथा व्याभिचारी तीनों को ही कारण माना है।² पण्डितराज जगन्नाथ भी रस की अनुभावना कराने वाले कारणों को अनुभाव कहते हैं।
व्यभिचारीभाव :
व्यभिचारी शब्द मे वि+अभि+चर् धातु का योग दिखाई पडता है । अतएव वाक्, अंङ्ग सत्त्वादि द्वारा विविध प्रकार के रसानुकूल संचरण करने वाले भावों को व्यभिचारी अथवा संचारी भाव कहते है।³ व्याभिचारी भाव स्थायी भाव के परिपोषक तथा उन्हें रसावस्था तक पहुँचाने वाले होते हैं, अस्थिरता उनका विशेषगुण है। स्थायी भाव के साथ इनका सम्बन्ध वारिधि के साथ कल्लोलों का सा है। उनका आविर्भाव-तिरोभाव होता रहता है।⁴ इसलिए उन्हें अचिर, अनवस्थित, जन्म वाला तथा संचारी भी कहते हैं। स्थायित्व के सहायक मात्र कहे जा सकते हैं। 'काव्य प्रकाश' ने स्पष्टतः इन्हें स्थायीभाव का सहकारी कहा है।⁵ इनकी संख्या तैंतीस मानी गयी है।⁶
स्थायीभाव :
स्थायी भाव मानव-मन की सूक्ष्म कृतियो से सम्बन्धित अथवा वासना रूप से प्रमाता के चित्त में सदैव रहने वाले भावों को कहते हैं। कारण के अनुपस्थित रहने पर भी स्थायीभाव की सत्ता रहती है, जबकि शेष भाव कारण के अभाव में निश्शेष हो
1 सा० द०, पृ० 3/132-33
2 सा० द०, पृ० 3/14
3 ना०सा०चौ०,पृष्ठ 84
4 दाशरूपक 4/7
5 काव्य प्रकाश, 4/27-28, सूत्र 43
6 काव्य प्रकाश पेज स०-100, चतुर्थउल्लास
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