शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextजाते है। काव्य में स्थायी भाव ही अनुकूल विभाव-अनुभाव तथा व्यभिचारी भावों के संयोग से रस रूप प्राप्त करने में समर्थ होता है।
स्थायी भाव अपने विरोधी अविरोधी किसी भी भाव से नष्ट नहीं होते।¹ ये स्वयं दूसरे भावो को अपने में अन्तर्हित कर लेते हैं। अन्य भावों को अपने वशवर्ती कर लेते हैं। इनमे चिरकालस्थायित्व, आप्रबन्ध-स्थायित्व अथवा अविच्छिन्न प्रवाहमयता होती है। स्थायीभाव चर्वणीय एवं आनन्ददायी होते है। स्थायी भाव की वासनारुपता के सम्बन्ध में अभिनवगुप्त ने सर्वप्रथम विचार किया, जिसका अनुसरण परवर्ती आचार्यों ने किया । भरत ने इनकी संख्या आठ मानी², कालान्तर में इनकी संख्या नौ दस तक पहुँच गयी। इनके नाम हैं- रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय, निर्वेद।³
शुकसप्तति में अङ्गीरस :
शुकसप्तति कथाग्रन्थ श्रृंगार रस से परिपूर्ण कथाग्रन्थ है। जिसमें श्रृंगार के दोनो भेद सयोग और विप्रलम्भ का स्वरूप प्राप्त होता है।
साहित्य शास्त्र के आचार्यों ने श्रृंगार को श्रेष्ठ तथा अधिक व्यापक स्वरूप में स्वीकार किया है।⁴ आनन्दवर्धन ने भी उसे मधुर रस माना है। (शृङ्गर एव मधुरः परः प्रह्लादनोरसः ) श्रृङ्गार रस दो प्रकार का होता है- संयोग⁵ तथा विप्रलम्भ⁶ मम्मट ने भी श्रृङ्गार के दो भेद-माने हैं- 1. सम्भोग श्रृंगार 2. विप्रलम्भ श्रृंगार।⁷ किन्तु दोनों ही अवस्थाओ मे इसका स्थायीभाव रति ही है, जो विभावानुभाव तथा व्यभिचारी भाव से
1 दशरूपक 4/34 सा० द० 3/174, रस०ग०पृ० 31
2 अष्टौ नाट्ये रसाः स्मृता। नाट्य द०
3
रतिहासश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भय तथा।
जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावा प्रकीर्तिता।
काव्यप्रकाश, पेज सं० 96, सूत्र संख्या 45
4 ना०शा०, 6/45, पृ० 300
5 सा०द०, 3/290, पृ० 148
6 सा०द०, 3/187, पृ० 233
7 काव्य प्रकाश पेज स०-121, चतुर्थउल्लास
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