शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextहोती है। विष्णु का विषकन्या के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।
दशमकथा : में उपपति आलम्बन है और देवसाख्य की दोनों पत्नियाँ शृङ्गारवती और सुभगा आश्रय हैं। उपपति को देखकर देवसाख्य की पत्नियो के हृदय में कामभावना जागृत होती है। शृङ्गारवती और सुभगा का उपपति के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
एकादशी कथा : में रम्भिका आश्रय है और ब्राह्मण पुत्र आलम्बन है, जिसे देखकर परपुरूष मे आसक्त रहने वाली रम्भिका के हृदय में कामभावना जागृत होती है। रम्भिका का परपुरूष से सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
द्वादशी कथा : में कुम्हार की स्त्री शोभिका आश्रय है और उपपति आलम्बन है जिसे देखकर परपुरुष में आसक्त रहने वाली शोभिका के हृदय में कामभावना जागृत होती है। शोभिका का परपुरूष के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
त्रयोदशी कथा : मे वणिक् पत्नी राजिका आश्रय है और उपपति आलम्बन है। उपपति को देखकर राजिका के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। उपपति के साथ राजिका का सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
चतुर्दशी कथा : मे धनश्री आश्रय है और पर पुरुष आलम्बन परपुरूष को देखकर धनश्री के हृदय मे काम भावना जागृत होती है। धनश्री का परपुरूष के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
पञ्चदशी कथा : में गुणाकर की पत्नी श्रिया देवी आश्रय है और सुबुद्धि नामक वणिक् आलम्बन है। वाणिक् को देखकर श्रियादेवी के हृदय में कामभावना जागृत होती है और श्रिया देवी का सुबुद्धि के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
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