शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
Page 159 of 208
Read in contextषोडशी कथा : में जनवल्लभ वणिक् की पत्नी मुग्धिका आश्रय है और परपुरूष आलम्बन है। परपुरूष को देखकर मुग्धिका के हृदय में कामभावना जागृत होती है और मुग्धिका का परपुरूष के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
त्र्योदशी कथा : में वणिक् पत्नी स्वच्छन्दा आश्रय है और सोढाक नामक सेठ आलम्बन है। सोढाक को देखकर स्वच्छन्दा के हृदय में कामभावना जागृत होती है और स्वच्छन्दा का सोढाक के साथ संभोग करना आदि अनुभाव है चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।
बीसवीं कथा : मे सूर नामक किसान की पत्नी केलिका आश्रय है और ब्राह्मण आलम्बन। ब्राह्मण को देखकर केलिका के हृदय ने काम भावना जागृत होती है और केलिका का ब्राह्मण के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
इक्कीसवीं कथा : में वणिक् पत्नी मन्दोदरी आश्रय है और राजपुत्र आलम्बन। राजपुत्र को देखकर मन्दोदरी के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। राजपुत्र के साथ मन्दोदरी का सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
बाईसवीं कथा : में किसान की पत्नी माढुका आश्रय हैं और सूरपाल आलम्बन। सूरपाल को देखकर माढुका के हृदय में काम भावना जागृत होती है। सूरपाल का माढुका के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
तेईसवीं कथा : में बणिक् पुत्र राम आश्रय है। कलावती नामक वेश्या आलम्बन। कलावती को देखकर राम के हृदय में कामभावना जागृत होती है और राम का कलावती के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
[ 149 ]